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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, August 20, 2017

राष्ट्रनिर्माता "सरदार पटेल" जाति से गुर्जर थे या कुर्मी??

Sardar patel Gurjar or Kurmi?????---

गुजरात के पटेल (पाटीदार) गुर्जर हैं या कुर्मी हैं?
या दोनो हैं या
इन दोनों ही जातियों से पाटीदारों का कोई सम्बन्ध है या नही?????

दरअसल गुजरात के पाटीदार कनबी/कुणबी जाति से आते हैं जो पटेल टाइटल लिखते हैं इनका उत्तर भारत की गूजर जाति से दूर दूर तलक कोई सम्बन्ध ही नही है,
न जाने कैसे इन्होंने सरदार पटेल और पाटीदारों को गूजर मानकर इसका प्रचार शुरू कर दिया जिसपर कुछ लोग भरोसा भी करने लग गए।
कुछ गूजर भाई दिल्ली से जाकर सरदार पटेल की पुत्री से मिले कि आप गूजर हो या नही, तो उन्होंने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया,
राजस्थान के गुर्जर आंदोलन में पटेलों ने कोई दिलचस्पी नही ली, पर गुजरात के पटेल आंदोलन में गुर्जर समर्थन देने पहुंच गए।
इनको मूर्ख बनाने हार्दिक पटेल एक बार दिल्ली भी आया था।
कुल मिलाकर गुजरात के पटेल/पाटीदार समाज से उत्तर भारत के गूजरो का कोई सम्बन्ध ही नही है।
अब जाकर कुछ समझदार गुर्जर बन्धु इस बात को मानने लगे हैं कि सरदार पटेल और पाटीदार का उत्तर भारत के गुर्जर समाज से कोई सम्बन्ध नही है।पर अधिकांश गुर्जर आज भी इसी झूठ को जी रहे हैं।
वैसे शारीरिक दृष्टि कद काठी नस्ल के हिसाब से देखे तो उत्तर भारत के गुर्जर गुजरात के पटेलों से बेहतर हैं, गोत्र/खाप/भाषा रिवाज इनमे कुछ भी एक दूजे से नही मिलता।

पटेल जिस कुणबी जाति के हैं वो भी उत्तर भारत के कुर्मी समाज की तरह एक कुशल कृषक समाज है, लोकतंत्र में संख्याबल दिखाने के लिए गुजरात के कुणबी पाटीदार और उत्तर भारत के कुर्मी खुद को एक ही होना प्रचारित करते हैं पर असल मे इन दोनों के गोत्र/खाप एक दूसरे से बिल्कुल भी नही मिलते।
यही नही मध्य प्रदेश में कुछ जिले तो ऐसे हैं जहां कुर्मी और (कुणबी)पाटीदार दोनो जातियां मिलती हैं और अलग अलग समाज माने जाते हैं इससे इनके एक ही जाति होने का खंडन हो जाता है,
दरअसल नाम और पेशे में कुछ साम्यता होने के अतिरिक्त गुजरात के (कुणबी)पटेल और यूपी एमपी बिहार के कुर्मी में भी कोई सम्बन्ध नही है।

मजे की बात है कि हरियाणा राजस्थान वेस्ट यूपी का गुर्जर सरदार पटेल को गुर्जर प्रचारित करता है और पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार के कुर्मी सरदार पटेल को कुर्मी बताकर उनकी जयंती मनाते हैं और उनकी देखा देखी पटेल टाइटल भी लिखते हैं जबकि सरदार पटेल न तो गुर्जर थे न ही कुर्मी!!
वो महान नेता थे जिन्होंने भारत राष्ट्र का एकीकरण किया था।वो सर्वसमाज के लिए पूजनीय हैं।

जय श्रीराम

गुर्जरदेश, गुर्जरात्रा और चौकीदार गुर्जर जाति की उत्पत्ति (Gurjar desh and modern Gurjar/Gujjar tribe


गुर्जरदेश, गुर्जरात्रा और चौकीदार गुर्जर जाति की उत्पत्ति (Gurjar desh and modern Gurjar/Gujjar tribe------

उत्तर मध्य काल में पश्चिम भारत मे एक प्रदेश होता था जिसका नाम था गुर्जरात्रा या गुर्जरदेश। इस प्रदेश की सीमा में आज के दक्षिण पश्चिम राजस्थान के जालोर, सिरोही, बाड़मेर जिले और आज के उत्तर गुजरात के बनासकांठा, पाटन और मेहसाणा आदि जिले आते थे। इस क्षेत्र का नाम यहां की अर्थव्यवस्था और समाज के गौपालन पर टिके होने की वजह से पड़ा। गूजर गौचर का ही अपभ्रंश है।

इस क्षेत्र में आज भी भारत के सबसे सघन घास के मैदान और गौचर भूमि मिलती है। इस कारण और सूखे क्षेत्र होने की वजह से कृषि बेहद सीमित होने के कारण यहां की जनसंख्या पूरी तरह गौपालन से जुड़ी हुई थी। यहां तक कि कुछ दशक पहले तक भी देश का यह संभवतया अकेला क्षेत्र था जहाँ गौपालन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था। देश की सबसे बड़ी पथमेड़ा गौशाला इसी क्षेत्र के बीचों बीच स्थित है। देश के सबसे बड़े घास के मैदान 'बनी' ग्रासलैंड इसी क्षेत्र में मिलते हैं। आज भी रबाड़ी, मालधारी, भरवाड़ आदि अनेक पशुपालक जातियो की इस क्षेत्र में बड़ी आबादी है। इसी लिए इस प्रदेश का नाम गौचर बहुल होने से गूजर या गुर्जरदेश पड़ा और यहां के निवासियों को गूजर/गुर्जर कहा गया। कई बार जैसलमेर-जोधपुर मरुस्थल को मिलाने के बाद इस प्रदेश को गुर्जर-मारू भी कहा जाता था। आज का गुजरात राज्य 1947 के बाद बना है जब भाषा के आधार पर सौराष्ट्र, कच्छ, पंचमहाल आदि क्षेत्र इस प्रदेश में मिलाए गए।

इस गुर्जरदेश पर कई राजपूत वंशो ने राज किया जिस कारण उन्हें गुर्जरपति कहा गया। इस आधार पर कई इतिहासकारों ने गलती से इन राजपूत वंशो को उत्तर पश्चिम भारत की पशुपालक/चोर/चौकीदार गूजर जाती से जोड़ दिया। जबकि अब ये सिद्ध हो चुका है कि प्रतिहारो और अन्य वंश के राजाओ को गुर्जरपति गुर्जरदेश पर शासन करने के कारण कहा गया।

चौकीदार गूजर और अन्य गूजर जातियां---

कालांतर में इस प्रदेश से बड़े पैमाने पर कई जातियों का दूसरे प्रदेशों में पलायन हुआ जो उन प्रदेश में गुर्जरदेश से आने के कारण गुर्जर के नाम से जानी गई। इनमे एक तरफ सौराष्ट्र और कच्छ में मिलने वाली गुर्जर ब्राह्मण, गुर्जर मिस्त्री, गुर्जर लोहार, गुर्जर बढ़ई आदि जातियां हैं जिनके इन क्षेत्रों में गुर्जरदेश से आकर बसने के कारण इनके जातिगत नाम के साथ स्थानसूचक शब्द का इस्तेमाल किया गया। इनके अलावा महाराष्ट्र के खानदेश में गूजर नाम की दो जातियां मिलती हैं- डोरे गुर्जर और रेवा गुर्जर। गुजरात से कई राजपूत वंश के लोग खानदेश में आकर बसे जो किन्ही कारणों से स्थानीय राजपूतो में नही मिल पाए। इनमे सबसे बड़ी आबादी डोर वंश के राजपूतो की थी जिनके आधार पर ये लोग डोरे गुर्जर नाम से जाने गए। इनके अलावा गुजरात के लेवा पाटीदार जाती के लोग खानदेश आकर रेवा गुर्जर के नाम से जाने गए। मध्यप्रदेश के मालवा और निमाड़ में भी मुरलिया गूजर, हेरे गूजर और लिलोरिया गूजर नाम की गूजर जातिया मिलती हैं जिनका आपस मे कोई वैवाहिक संबंध नही और समानता सिर्फ इतनी है कि इन सभी को गुर्जरदेश से आने के कारण गूजर कहा जाता है।

इन जातियो के अलावा गूजर नाम की जातियो में सबसे बड़ी जाती है चौकीदार गूजर। गुर्जरदेश के शासक प्रतिहार राजपूतो की एक शाखा का ढूंढाड़ के राजौर में शासन स्थापित होने के बाद उनके साथ गुर्जरदेश से ढूंढाड़ में बड़ी संख्या में गौचर जातियो का पलायन हुआ जहां इन्हें गुर्जर कहा गया। इन गुर्जरों पर राज करने के कारण राजौर के प्रतिहार राजपूतो को बड़गुर्जर कहा गया। ढूंढाड़ में इन गौचर जातियो का आजीविका का साधन पशुपालन के साथ चौकीदारी और चोरी चकारी था। राजपूतो द्वारा बसाए जाने के कारण ये लोग राजपूतो के करीब थे और राजपूत सेनाओं को दूध-दही की आपूर्ति किया करते थे। कालांतर में इस चौकीदार गौचर जाती का फैलाव यमुना और गंगा की घाटियों से शिवालिक होते हुए पंजाब और कश्मीर तक हो गया। कश्मीर के गूजरो द्वारा बोली जाने वाली गूजरी बोली में गुजराती और राजस्थानी भाषा का गहरा प्रभाव होना इस बात की और इंगित करता है। इसी तरह इनके राजपूतो के 'करीब' रहने के कारण कई राजपूत वंश कई कारणों😉 से गिर कर इनमे शामिल होते गए।

गूजरो के हूणों का वंशज होने का दावा---

गूजर बड़े गर्व से अपने को हूण से लेकर कुषाण, जॉर्जियन लगभग हर विदेशी आक्रमणकारी की औलाद बताते हैं। इनमे सबसे करीबी दावा हूणों से संबंध का है। हूण आक्रमणकारियों ने भारत मे सिर्फ कश्मीर और गांधार क्षेत्र में कुछ समय के लिये राज किया था। हूणों ने मध्य भारत पर आक्रमण जरूर किये थे लेकिन उन्हें हर बार सोमवंशी गुप्त शासकों ने खदेड़ दिया था और राजतरंगिणी जैसे कई ऐतिहासिक ग्रंथो के अनुसार कई बार यहां से खदेड़े जाने के बाद ये लोग अंत में काबुलिस्तान और जाबुलिस्तान में जाकर बस गए थे जिसे आज पख्तूनिस्तान कहा जाता है।

आज कल के चौकीदार गूजरो के प्रोपगंडा पर यकीन कर के अगर इन्हें हूणों का वंशज मान भी ले तो ये सिर्फ हूण आक्रमणकारियों द्वारा स्थानीय महिलाओं के साथ सम्बन्धो से उत्पन्न जाति ही मानी जा सकती है क्योंकि ना तो हूण यहां अपनी महिलाओं के साथ आए थे और ना ही वो इस क्षेत्र में कही बसे। इन चौकीदार गूजरो में मिलने वाले हूण गोत्र के गूजर इन हूण आक्रमणकारीयो द्वारा किये गए सम्बन्धो से उतपन्न संतान हो सकती है जिन्हें अलग गोत्र मानकर चौकीदार गूजर जाती में शामिल कर लिया गया हो। हूणों का कश्मीर और उत्तर पश्चिम पंजाब पर जरूर कूछ समय के लिये शासन रहा जिससे कश्मीर के पहाड़ी गूजरो में हूणों के वंशजों के शामिल होने की संभावना है जिसकी पुष्टि डीएनए टेस्ट से भी हो चुकी है जिसमे मैदानी और पहाड़ी गूजरो में बहुत फर्क बताया गया है।

Monday, October 31, 2016

कारगिल युद्ध के अमर शहीद स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर (Sqn Ldr Rajiv Pundir)


कारगिल युद्ध के शहीद स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर-----

Sqn Ldr Rajiv pundir, Flying (Pilot) 
स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर का जीवन परिचय------

शहीद राजीव पुंडीर का जन्म दिनांक 28 अप्रैल 1962 में ग्राम बड़ोवाला जिला देहरादून उत्तराखण्ड में ठाकुर राजपाल सिंह व हेमवती पुंडीर के घर हुआ। उन्होंने 1979 में राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी में प्रवेश कर सैन्य जीवन की शुरुआत की। इनका विवाह सहारनपुर के नकुड क्षेत्र के गांव में शर्मिला सिंह से हुआ।
शहीद पुंडीर एक बेहतरीन पायलट होने के साथ एक कुशल खिलाड़ी, गायक व संगीत प्रेमी थे।

कारगिल विजय और ऑपरेशन विजय----
वर्ष 1999 में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारतीय क्षेत्र में घुस कर कई महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्जा कर लिया था। इन स्थानों को दुश्मनों से छुड़ाने के लिए आपरेशन कारगिल विजय शुरू किया गया। सैनिको ने बहादुरी का परिचय देते हुए देश की आन बान और शान बचाने को सर्वोच्च बलिदान दिया और यहां तिरंगा फहराया।

आपरेशन विजय के दौरान 28 मई 1999 को सरसावा वायुसेना स्टेशन पर तैनात स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर और उनके साथियों ने शत्रुओं की गतिविधियों की जानकारी लेने और रसद पहुंचाने के लिए MI-17 लड़ाकू हेलीकॉप्टर से उड़ान भरी। उन्होंने अपने ऑपरेशन को भली भाँति अंजाम दिया।एक के बाद एक दुश्मनो के विरुद्ध विभिन्न चोटियों पर जमकर गोलीबारी की जिसमे कई दुश्मन हताहत हुए।

इसके बाद दुश्मनों के क्षेत्र में उनकी गतिविधियों का जायजा ले ही रहे थे कि पाकिस्तानी घुसपैठियों ने मिसाइल से उनके हेलीकाप्टर पर धावा बोल दिया।इन वीरों ने अदम्य साहस व वीरता का परिचय देते हुए अपने हेलीकाप्टर में आंतकियों द्वारा दागी गई मिसाइल लगने के बावजूद गोलीबारी जारी रखी और कई घुसपैठियों को मार गिराया।

मिसाइल की चपेट में आने से वायुसेना स्टेशन सरसावा के चार जांबाजों स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एस मुहिलन, सार्जेट पीवीएन आर प्रसाद तथा सार्जेट आरके साहू 28 मई 1999 को कारगिल में शहीद हुए थे।
जिस वक्त मात्र 37 वर्ष की आयु में स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर शहीद हुए उनकी बेटी भव्या सात साल और बेटा करन केवल छह महीने का था।उनकी पत्नी को सरकार द्वारा पेट्रोल पम्प भी आवंटित किया गया।

इसके बाद थलसेना की विभिन्न बटालियनों ने अपनी जान पर खेलकर उच्च बलिदान देकर कारगिल की चोटियों से दुश्मन को मार भगाया।
वायुसेना के चारो शहीदों के नाम पर सरसावा वायुसेना स्टेशन के चार महत्वपूर्ण पथों का नाम रखा गया है और इन शहीदों की याद में यहाँ शहीद स्मारक बना हुआ है जिस पर प्रत्येक वर्ष इन्हें मोमबत्ती जलाकर श्रद्धासुमन अर्पित कर मेले का आयोजन किया जाता है।

सरकार ने आपरेशन विजय और शहीदों की याद में 26 जुलाई को विजय दिवस मनाने का निर्णय लिया। विजय दिवस के अवसर पर राष्ट्र के वीरों को शत शत नमन ।
जय हिन्द जय राजपूताना।
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Squadron Leader Rajiv Pundir, Flying (Pilot),
No. 152 Helicopter Unit, Mi-17 ,
KIA 28 May 1999

Squadron Leader Rajiv Pundir of the IAF was killed in action on 28 May 99 while flying as a co-pilot of a Mi-17 helicopter being flown in the attack role during a mission against infiltrator held ground positions within the Indian side of the line of control.

A graduate of the National Defence Academy and a post graduate in Military Studies from the prestigious Defence services Staff College, Sqn Ldr Pundhir was the Flight commander of a Mi-17 Helicopter Squadron. The officer displayed courage of an extremely high order and carried out successful combat missions against heavily defended ground targets. He made the supreme sacrifice during one such mission by carrying out attacks in a very hostile environment wherein the opposition on ground was known to possess a surfeit of surface to air missiles, in spite of which the officer carried out repeated attacks in the face of lethal enemy opposition.

His courageous action in the face of enemy fire contributed significantly to the support being given by the IAF to the Indian Army in its efforts to dislodge the intruders from our territory.

Sqn Ldr Rajiv Pundir was commissioned in the IAF on 28 Apr 83 and was an experienced Helicopter pilot experienced on, among other aircraft, the Heavy Lift Mi-26 Helicopter besides having 2500 hours on the Mi-8 and Chetak/Cheetah helicopters.

An alumni of St Josephs Academy, Dehradun Rajiv Pundir was a thorough professional with a zest for doing things well. A very enthusiastic and energetic young man he remained at the centre stage of all activity. A keen sportsman, he had a passion for music and was an accomplished singer.

Sqn Ldr Rajiv Pundir is survived by his wife Mrs. Sharmila Pundhir, a seven-year-old daughter Bhavya, and a four and a half-year-old son Karan.
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Reference-------------
1- http://www.bharat-rakshak.com/IAF/Personnel/Martyrs/199-9-Kargil.html
2-http://m.jagran.com/uttar-pradesh/saharanpur-9309699.html
3-http://m.amarujala.com/news/states/uttar-pradesh/saharanpur/Saharanpur-57649-50/

Saturday, October 29, 2016

लौहपुरुष ठाकुर राजनाथ सिंह ,देश के यशस्वी गृहमंत्री

ठाकुर राजनाथ सिंह, देश के यशस्वी गृहमंत्री-------

समुद्र मंथन के पश्चात् अमृत के साथ साथ हलाहल विष भी निकला था। अमृत देवताओं के हिस्से आया। देवतागण अमृतपान करके अमर हो गये। किन्तु ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए विषपान भगवान शंकर ने किया था। इसी से भगवान शिवजी नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
आधुनिक काल में नीलकंठ की भूमिका जिस शख्स ने निभाई,उनका नाम है केन्द्रीय गृह मंत्री ठा० राजनाथ सिंह।
नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित कराने में राजनाथ सिंह की सशक्त भूमिका रही। बीजेपी के चुनाव अभियान में राजनाथ सिंह कंधे से कंधा मिलाकर मोदी जी के साथ खड़े रहे। ये मोदी लहर और राजनाथ सिंह की संगठन क्षमता का ही कमाल था कि बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2014 में जबर्दस्त विजय प्राप्त की।राजनाथ ने हर बुराई अपने सर ले ली और सब श्रेय मोदी जी को लेने दिया।

----जीवन परिचय----
जन्म-10 जुलाई 1951 (आयु 64 वर्ष) , इनका जन्म रैकवार RAIKWAR राजपूत वंश में हुआ है
जन्मस्थान---भभौरा, चंदौली जिला, उत्तर प्रदेश, उनके पिता का नाम राम बदन सिंह और माता का नाम गुजराती देवी था।
जीवन संगी-सावित्री सिंह
संतान--2 पुत्र 1 पुत्री
विद्याअर्जन-गोरखपुर विश्वविद्यालय
पेशा -भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता
शुरू से आरएसएस और जनसंघ से जुड़े रहे।आपातकाल का जमकर विरोध किया।इंदिरा गांधी की जनसभा में अकेले दम पर जमकर हंगामा किया और काले झंडे दिखाए।तब से संघ परिवार की नजरो में छाने लगे।

----राजनितिक जीवन की शुरुआत----
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में बेहद युवावस्था 26 वर्ष की आयु में पहली बार मिर्जापुर से विधायक बने।

80 के दशक में भाजयुमो के राज्य अध्यक्ष और उसके बाद राष्ट्रिय अध्यक्ष भी रहे।

कल्याण सिंह सरकार में 1991 में यूपी के प्रभावी शिक्षामंत्री रहे।इनके द्वारा लागु किये नकल और ट्यूशन विरोधी कानूनों ने शिक्षा माफियाओ को ध्वस्त कर दिया था और यूपीबोर्ड में नकल बन्द हो गयी थी। उन्होंने बोर्ड परीक्षा में नकल को गैर जमानती अपराध बना दिया। आज तक उन्हें इस कार्य के लिए याद किया जाता है। इसके अलावा उन्होंने दोबारा इतिहास लिखवा कर इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव करवाया और वैदिक गणित को पहली बार पाठ्यक्रम में शामिल किया।

उनके मंत्री के रूप में कामकाज, ईमानदारी और लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें जल्द ही भाजपा का प्रदेशाध्यक्ष बना दिया गया। प्रदेशाध्यक्ष के कार्यकाल में कार्यकर्ताओ में इतनी लोकप्रिय हुए कि उन्हें जल्द ही 1999 में वाजपेयी सरकार में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री बना दिया गया।

----मुख्यमंत्रिकाल----
राजनाथ सिंह जी सन् 2000–2002 के बीच यूपी के मुख्यमन्त्री रहे।
प्रदेश में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें 2000 में केंद्र से वापिस बुलाकर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। इस कार्यकाल में उन्होंने आरक्षण व्यवस्था को ठीक करने के लिये कड़े कदम उठाए। उन्होंने पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित वर्ग में विभाजन को लागू किया जिससे आरक्षण का लाभ वास्तविक अति पिछडो तक पहुँचे। लेकिन जातिवाद से ग्रस्त कोर्ट ने इसे भी बाद में खारिज कर दिया।

उनका कार्यकाल आज भी उच्च कोटि के प्रशासन के लिए याद किया जाता है।  किन्तु जातिवादी ताकतों को एक ठाकुर का मुख्यमन्त्री बनना रास नही आया और इसी कारण मुख्यमन्त्री के रूप में जबरदस्त सफलता के बावजूद बीजेपी की हार हुई।
अगर राजनाथ सिंह को यूपी के मुख्यमन्त्री पद पर कार्य करने हेतु एक कार्यकाल और मिल जाता तो आज यूपी की ये दुर्दशा नही होती।

2003 में राजनाथ सिंह जी को केंद्रीय कृषि मंत्री बनाया गया। इस छोटे से कार्यकाल में उन्होंने अनेक योजनाए शुरू करी। किसान क्रेडिट कार्ड योजना इन्हीं की देन है। किसान कॉल सेंटर और खेती आय बीमा योजना भी इन्होंने ही शुरू करी थी। इसके अलावा किसानो को लोन देने में ब्याज दर में कमी और किसान आयोग प्रथम बार स्थापित करने का श्रेय भी राजनाथ सिंह जी को जाता है।

2002 के बाद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा जानबूझकर राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश की राजनीति से दूर रखा गया और प्रदेश में अपने जनाधारविहीन चमचो को वरीयता दी। यहां तक की अटल आडवाणी की जोड़ी ने मायावती को भाजपा के हितो के ऊपर वरीयता दी। इन कारणों से भाजपा उत्तर प्रदेश में कमजोर होती गई। इस दौरान उन्हें विभिन्न राज्यो का प्रभारी महासचिव बनाकर भेजा गया और हर जगह उन्होंने उन विपरीत परिस्थितियों में भी कमल खिलाया। राजनाथ सिंह केंद्रीय नेतृत्व द्वारा उपेक्षा के बावजूद पार्टी के अनुशासित सिपाही बनकर बिना कोई रोष जताए काम करते रहे। दुसरे चुनावो में भी उनकी सभाओ के लीये उम्मीदवारो द्वारा डिमांड और उनकी सभाओ में भीड़ ने उन बेवकूफ विश्लेषकों की बोलती बन्द कर दी जो उन्हें जनाधारविहीन नेता साबित करने की कोशिश करते थे।

भाजपा जब केंद्र में घोर गुटबाजी और नेतृत्व के संकट से जूझ रही थी तो उनकी ईमानदारी, पार्टी और हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता और गुटबाजी से दूर रहने के कारणों की वजह से उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। लाल कृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे नेताओ की गुटबाजियो और अंडरखांने विरोध के बावजूद वो भाजपा में पहली बार लगातार दूसरी बार भी राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए।

दूसरी बार 23 जनवरी 2013 – 09 जुलाई 2014 तक।इस बार राजनाथ सिंह ने मोदी के साथ मिलकर अपनी कुशल रणनीति से बीजेपी को प्रचण्ड बहुमत दिलाया।जीत के असली हीरो वही थे पर मोदी जी ने जीत का श्रेय अमित शाह को दे कर उन्हें राष्ट्रिय अध्यक्ष बना दिया।
अरुण जेटली और बीजेपी के ठाकुर विरोधी नेताओं ने उन्हें कई बार बदनाम करने का प्रयास किया पर वो विफल रहे।क्योंकि सब जानते हैं कि राजनाथ सिंह का चरित्र शीशे की तरह साफ़ है।

26 मई 2014 से देश के ग्रह मंत्री हैं।तब से पूर्वोत्तर के आतंकियों को म्यांमार में घुसकर मारने का निर्णय उन्ही का था।चीनी घुसपैठ और नक्सलवाद पर प्रभावी रोक लगाई।राजनाथ सिंह जी ने सीमा पर पाकिस्तान की ओर से होने वाली गोलीबारी का मुहतोड़ जवाब देने के लिए अर्धसैनिक बलों को खुली छूट दी है और कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को माकूल जवाब दिया है।
गौहत्या विधेयक के प्रबल समर्थक,पर अभी मोदी जी ने हरी झण्डी नही दी।
राजनाथ सिंह धर्मान्तरण पर पूर्ण रोक के पक्ष में हैं।

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी ने सर्वसम्मति से कुछ अप्रिय निर्णय लिए गये,जिनका पूरा अपयश राजनाथ सिंह ने अपने सर ले लिया।
वहीं हर प्रकार के अच्छे कार्य का श्रेय उन्होंने मोदी जी को दिया,जिससे जनता में मोदी जी का यशगान होता रहे।उनकी प्रतिभा और लौह पुरुश की छवि से प्रभावित मोदी जी ने स्वयम उनसे गृह मंत्री बनने का आग्रह किया,जिसे वो टाल नही पाए।

कुछ राजपूत भाई भी अज्ञानतावश व कुछ निजी खुन्नस के कारण उनकी आलोचना करते हैं। जबकि कुछ अन्य समाज के लोग जो राजपूतों को उच्च पद पर देखना नही चाहते,वो भी राजनाथ सिंह की अनर्गल आलोचना करते हैं।

जबकि राजनाथ सिंह बेहद ईमानदार,हिन्दुत्ववादी, जातिवाद से दूर,पक्षपात रहित लौह इरादों वाले नेता हैं।
बीजेपी के इतिहास में उनसे सफल राष्ट्रिय अध्यक्ष कोई दूसरा नही हुआ है।
प्रधानमन्त्री मोदी जी इन्हें यूपी विधानसभा चुनाव 2017 के लिए बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना चाहते हैं जिसे अभी तक राजनाथ सिंह अस्वीकार कर रहे हैं।वैसे इस समय राजनाथ सिंह यूपी के सबसे योग्य और लोकप्रिय नेताओं में हैं।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वे सरदार पटेल की भांति सफल गृह मंत्री के रूप में इतिहास में याद किये जाए। और मोदी जी के नेत्रत्व में देश सभी संकटों से दूर रहकर उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।

जय श्री राम,जय भारत,जय राजपूताना।

Sunday, September 18, 2016

पृथ्वीराज रासो अथवा पृथ्वीराज विजय में कौन अधिक प्रमाणिक??

कल रात एबीपी न्यूज़ पर उनके धारावाहिक "भारतवर्ष" में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर प्रसारण हुआ,
इस एपिसोड में साफ़ दिखाई दिया कि पृथ्वीराज चौहान और उनके शासन काल/उत्थान/पतन का प्रमाणिक वर्णन करने में चन्दबरदाई कृत काव्य ग्रन्थ "पृथ्वीराज रासो" पूर्ण सक्षम नही है,
न तो पृथ्वीराज रासो में उल्लिखित घटनाओं के तिथि संवत का ऐतिहासिक साक्ष्यों से मिलान होता है न ही कई घटनाओं की पुष्टि होती है,हाँ पृथ्वीराज के दरबार में ही एक कश्मीरी ब्राह्मण जयानक थे जिन्होंने पृथ्वीराज के जीवनकाल में ही
"पृथ्वीराज विजय" ग्रन्थ लिखा था जिसमे दर्ज घटनाओं और तिथि संवत का शत प्रतिशत प्रमाणन ऐतिहासिक साक्ष्यों से हो जाता है,यह ग्रन्थ अधिक प्रसिद्ध नही हुआ तथा चौहान साम्राज्य के ढहते ही ओझल सा हो गया,ब्रिटिशकाल में एक अधिकारी बुलर महोदय को कश्मीर यात्रा के समय यह ग्रन्थ जीर्ण शीर्ण अवस्था में मिला तो उसमे उल्लिखित घटनाएं और संवत पूर्णतया सही पाए गए,पर दुर्भाग्य से पृथ्वीराज विजय का एक भाग ही प्राप्त हो पाया है,दूसरा भाग अभी तक अप्राप्य है।

तभी से समस्त इतिहासकार एकमत हैं कि पृथ्वीराज चौहान के विषय में समस्त जानकारी पाने के लिए पृथ्वीराज विजय सर्वाधिक प्रमाणिक हैं ,
हालाँकि कुछ घटनाएं पृथ्वीराज रासो में भी सही हो सकती हैं,

यद्यपि पृथ्वीराज रासो वीर रस का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है किन्तु इसकी ऐतिहासिकता संदेहास्पद है,
कुछ असमंजस जो इस धारावाहिक में दिखाई दिए और आम तौर पर रासो को प्रमाणिक मानने में बाधक हैं ????

1--रासो में तैमूर, चंगेज खान, मेवाड़ के रावल रतनसिंह-पदमावती जौहर,ख़िलजी जैसे बाद की सदियों में जन्म लेने वाले चरित्रों और घटनाओ के नाम/प्रसंग आ गए,जबकि उनका जन्म ही पृथ्वीराज चौहान के सैंकड़ो वर्ष बाद हुआ था।

2--रासों में लिखी काव्य की भाषा में फ़ारसी,तुर्की के बहुत से ऐसे शब्द थे जो बहुत बाद में भारतवर्ष में मुस्लिम शासन काल में प्रचलित हुए।

3--रासो के अनुसार जयचंद के द्वारा डाहल के कर्ण कलचुरी को दो बार पराजित और बंदी किए जाने का उल्लेख मिलता है, किंतु वह जयचंद से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व हुआ था।

4--पृथ्वीराज रासो ही अकेला और प्रथम ग्रन्थ था जिसमे कन्नौज के सम्राट जयचन्द्र को राठौड़ वंशी लिखा है जबकि कन्नौज के चन्द्रदेव,गोविंदचंद्र, विजयचंद्र तथा जयचन्द्र आदि सम्राटो ने अपने किसी भी ताम्रपत्र शिलालेख में खुद को राठौड़ अथवा राष्ट्रकूट नही लिखा,जबकि उनसे कुछ समय पूर्व ही राष्ट्रकूट बेहद शक्तिशाली वंश के रूप में पुरे देश में प्रसिद्ध थे,समूचे दक्षिण भारत पर राष्ट्रकूट राठौड़ वंश का शासन था और कई बार उन्होंने उत्तर भारत में कन्नौज तक हमला किया था,

दरअसल जयचन्द्र और उनके पूर्वज पूर्वी भारत के काशी राज्य के शासक थे और गहरवार/गहड़वाल वंशी थे,
काशी नरेश चन्द्रदेव गहरवार ने कन्नौज/बदायूं के शासक गोपाल राष्ट्रकूट (राठौड़) को हराकर उनसे कन्नौज ले लिया था और गोपाल राष्ट्रकूट को बदायूं का सामन्त बना लिया था,

आज के आधुनिक राठौड़ बदायूं के राष्ट्रकूट राजवंश के ही उत्तराधिकारी हैं जिनके पूर्वज दक्षिण के इंद्र/अमोघवर्ष राष्ट्रकूट के नेतृत्व में कन्नौज पर प्रतिहार राजपूतो के शासनकाल में हमला करने आए थे और यही बस गए थे।।

सम्राट जयचंचन्द्र गहरवार को जयचन्द्र राठौड़ कहकर भ्रान्ति फ़ैलाने की शुरुवात पृथ्वीराज रासो से ही प्रारम्भ हुई।
जबकि जयचन्द्र के पूर्वज गोविंदचंद्र गहरवार का विवाह राष्ट्रकूट शासक की पुत्री मथनदेवी से हुआ था,जिससे स्पष्ट है कि दोनों अलग वंश थे।

5--रासो के अनुसार मेवाड़ के रावल समरसिंह को पृथ्वीराज चौहान का बहनोई बताया गया है और उन्हें तराईन के युद्ध में लड़ता दिखाया गया है
जबकि मेवाड़ के रावल समरसिंह का जन्म ही पृथ्वीराज की मृत्यु के 80 वर्ष बाद हुआ था!!

6--रासो के अनुसार------ पृथ्वीराज चौहान की माता कमला देवी दिल्ली के शासक अनंगपाल तोमर की पुत्री थी,और अनंगपाल तोमर ने अपने दौहित्र पृथ्वीराज को दिल्ली उत्तराधिकार में दी थी,पृथ्वीराज चौहान का बाल्यकाल में राज्याभिषेक दिल्ली की गद्दी पर हुआ था,

जबकि सच्चाई यह है कि पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज अजमेर के शासक विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव ने दिल्ली के शासक मदनपाल तोमर पर हमला कर दिल्ली को जीत लिया था और मदनपाल तोमर ने अपनी पुत्री देसल देवी का विवाह बीसलदेव से किया था,जिसके बाद बीसलदेव और अजमेर के चौहानो के अधीन ही दिल्ली में पहले की भाँती तोमर वंश के शासक राज करते रहे,

अनंगपाल तोमर प्रथम का शासन काल सन् 736-754 ईस्वी के बीच था जबकि अनंगपाल तोमर द्वित्य का काल सन् 1051-1081 ईस्वी था,इनके अतिरिक्त कोई अनंगपाल हुए ही नही,
फिर दिल्ली नरेश अनंगपाल पृथ्वीराज चौहान के नाना कैसे हो सकते हैं क्योंकि उनके जन्म लेने के लगभग 80-85 वर्ष पूर्व ही अनंगपाल जी स्वर्गवासी हो गए थे??

सच्चाई यह है कि पृथ्वीराज की माता चेदि के हैहयवंशी कलचुरी राजपूत शासक की पुत्री कर्पूरी देवी थी,
पृथ्वीराज का राज्याभिषेक दिल्ली में नही अजमेर में हुआ था,दिल्ली पर पृथ्वीराज चौहान के समय पृथ्वीराज तोमर और बाद में गोविन्दराज तोमर का शासन था जो अजमेर के मित्र और सामन्त थे।।।

7--रासो के अनुसार दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की एक पुत्री अजमेर के सोमेश्वर (पृथ्वीराज के पिता) से और दूसरी का विवाह कन्नौज नरेश जयचन्द्र से हुआ था,
इस नाते जयचन्द्र पृथ्वीराज के मौसा थे और पृथ्वीराज ने बलपूर्वक अपने मौसा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता से विवाह किया था!!!!

क्या मौसा की पुत्री से विवाह राजपूतो में सम्भव है???
कदापि नही,

हम ऊपर बता चुके हैं कि पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द्र के समय अनंगपाल तोमर थे ही नही उनसे बहुत पहले हुए थे,अत जयचन्द्र पृथ्वीराज के मौसा थे यह कथा कपोलकल्पित है,

यही नही संयोगिता हरण की कथा के भी पर्याप्त साक्ष्य नही मिलते,सर्वाधिक प्रमाणिक ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय में मात्र यह लिखा है कि पृथ्वीराज किसी तिलोत्तमा नामक अप्सरा के स्वप्न देखा करते थे,उसमे कहीं कन्नौज नरेश की पुत्री संयोगिता या उसके हरण का कोई उल्लेख ही नही है।।

8--कन्नौज नरेश सम्राट जयचन्द्र गहरवार पर गद्दार और देशद्रोही होने आक्षेप सबसे पहले पृथ्वीराज रासो में ही हुआ है,रासो के अनुसार जयचन्द्र ने ही गौरी को भारत पर हमला करने को आमन्त्रित किया था,
जो कि पूर्णतया निराधार है,
जयचन्द्र के सम्बन्ध पृथ्वीराज से अच्छे नही थे उसने पृथ्वीराज की मदद नही की यह सत्य है।
लेकिन गौरी को उसने बुलाया इस सम्बन्ध में किसी तत्कालीन मुस्लिम ग्रन्थ में भी कहीं नही लिखा,
न ही कोई अन्य साक्ष्य इस सम्बन्ध में मिलता है,

जयचन्द्र गहरवार को देशद्रोही और गद्दार बताने का निराधार आरोप पृथ्वीराज रासो के रचियेता के दिमाग की उपज है जिसकी कल्पनाओ ने इस महान धर्मपरायण शासक को बदनाम कर दिया और जयचन्द्र नाम देशद्रोह और गद्दारी का पर्यायवाची हो गया!!!

9--रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज की पुत्री बेला का विवाह महोबा के चन्देल शासक परमाल के पुत्र ब्रह्मा से होता है और ब्रह्मा की मृत्यु पृथ्वीराज के समय ही हो जाती है जबकि पृथ्वीराज चौहान अपनी मृत्यु के समय मात्र 26/27 वर्ष के थे तो उस समय उनकी पुत्री बेला का विवाह सम्भव ही नही था।

10--रासो में पृथ्वीराज चौहान द्वारा दक्षिण के यादव राजा भाणराय की कन्या से होना, एक विवाह चन्द्रावती के राजा सलख की पुत्री इच्छनी से होना और उन विवाहो की वजह से उसका गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव से संघर्ष होना लिखा है जबकि देवगिरि में कोई भाणराय नामक राजा हुआ ही नही और चन्द्रावती के किसी सलख नामक राजा के होने का भी कोई उल्लेख नही मिलता,
रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज ने गुजरात के शासक भीमदेव का वध किया जबकि उसकी मृत्यु पृथ्वीराज के 7 वर्ष बाद हुई।

रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज ने उज्जैन नरेश भीमदेव की पुत्री इंद्रावती से विवाह किया,जबकि उज्जैन में भीमदेव नाम का कोई शासक हुआ ही नही।

ऐसी ही दर्जनों कपोलकल्पित कथाए पृथ्वीराज रासो में भरी पड़ी हैं।।

12--रासो में गौरी के पिता का नाम सिकन्दर लिख दिया जो उससे 1300 वर्ष पहले हुआ था,इसके अलावा मौहम्मद गौरी के सभी सेनानायकों के नाम गलत लिखे गए हैं।

13--रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज के बहनोई मेवाड़ के रावल समरसिंह ने मांडू से मुस्लिम बादशाही को उखाड़ दिया जबकि मांडू(चन्देरी) में मुस्लिम सत्ता ही सन् 1403 में दिलावर गौरी द्वारा स्थापित हुई थी,जिसे राणा सांगा ने 1518 ईस्वी में उखाड फेका था ,
इससे लगता है कि रासो ग्रन्थ कहीं 16 वी सदी में तो किसी ने नही लिखा???

14--और अंत में,पृथ्वीराज रासो में उल्लिखित घटनाओं के तिथि संवत ऐतिहासिक साक्ष्यो से कतई मेल नही खाते,पृथ्वीराज रासो के अनुसार यह घटनाएं 11 वी सदी में हुई जबकि मौहम्मद गौरी और समकालीन मुस्लिम शासको का 12 वी सदी के अंतिम दशक में होना प्रमाणित है और पृथ्वीराज विजय में उल्लिखित घटनाओ का तिथि क्रम एकदम मेल खाता है।।
रासो में पृथ्वीराज की मृत्यु 1101 ईस्वी में लिखी है जबकि उनकी मृत्यु 1192 ईस्वी में हुई,
यदि चन्दबरदाई पृथ्वीराज के समकालीन होते तो इतनी बड़ी भूल कैसे करते??

इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस प्रकार महाऋषि वेदव्यास कृत जय नामक ग्रन्थ जो मूल रूप से 8800 श्लोक में लिखा गया था,वो आज कपोलकल्पित कथाए जोड़कर 1 लाख से अधिक श्लोक का हो गया है जिसमे क्या सही क्या मनगढंत पता नही लगता।

इसी प्रकार या तो पृथ्वीराज रासो को किसी ने 1400 ईस्वी या उसके भी बाद लिखकर मशहूर कर दिया जिसमे बाद में होने वाली घटनाएं भी जोड़ दी या यह ग्रन्थ मूल रूप में सही हो पर बाद में इसमें नई नई फर्जी कपोलकल्पित घटनाए जोड़कर इसकी ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता को नष्ट कर दिया।।

रासो की वजह से ही राजपूत समाज में कई गलत मान्यताओ का प्रचार हो गया और यह मान्यताए समाज में भीतर तक स्थान बना चुकी हैं,जिन्हें झुठलाना लगभग असम्भव हो गया है।

पृथ्वीराज चौहान गत 1000 वर्षो में हुए महानतम यौद्धाओं में एक हैं जो दुर्भाग्यपूर्वक मात्र 26 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हो गए अन्यथा वो पुरे भारत के एकछत्र सम्राट होते,
उनके विषय में सम्पूर्ण प्रमाणिक जानकारी कश्मीरी कवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय नामक ग्रन्थ से ली जा सकती हा,किन्तु दुर्भाग्य से उसका एक भाग अभी तक अप्राप्य है।

लेखक---धीरसिंह पुण्डीर जी से साभार

Sunday, September 11, 2016

सन् 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के योद्धा क्रांतिवीर बरजीरसिंह,तांत्या टोपे के दाहिने हाथ

जय क्षात्र धर्म की मित्रों , आज हमने कुछ समय पहले एक पोस्ट श्रृंखला शुरू की थी जिसमे आपको पोस्ट के माध्यम 1857 की क्रांति में महान राजपूत नायकों द्वारा दिए गए योगदानो से अवगत कराना था। आज उसी श्रृंखला में आगे बढ़ते हुये बुंदेलखंड के महान नायक क्रांतिवीर योद्धा बरजीर सिंह के बारे में बताएँगे। कृपया इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा पढ़ें और शेयर करें।

^^^^^प्रथम स्वातंत्र्य समर के योद्धा क्रांतिवीर बरजीरसिंह^^^^

सन १८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर में देश के कोने कोने में स्वतंत्रता प्रेमियों ने अंग्रेजो को कड़ी चुनौती दी थी। इस महासंग्राम में देश की जनता ने भी क्रांतिकारियों का पूरा साथ दिया। क्रांति के इस महायज्ञ में अनेक वीरो ने अपने जीवन की आहुतियाँ दी थी। उनमे से कुछ सूरमा ऐसे भी थे,जो जीवन भर अंग्रेजो से संघर्ष करते रहे लेकिन कभी अंग्रेजो की गिरफ्त में नहीं आए। ऐसे ही एक योद्धा थे बरजीर सिंह।झाँसी और कालपी के मध्य में स्थित बिलायाँ गढ़ी के बरजीर सिंह ने अंग्रेजो का सामना करने के साथ साथ क्षेत्र में जनसंपर्क द्वारा जनजागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया। जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई झांसी से कालपी जा रही थी तो रास्ते में  बरजीर सिंह ने उनसे भेंट की। रानी के निर्देशानुसार इस वीर ने क्षेत्र के गाँव गाँव में घूम घूमकर जनजागरण कर क्रांतिकारियों की शक्ति को कई गुना बाधा दिया। बरजीरसिंह ने कालपी की लड़ाई में प्राणप्रण से भाग लिया,लेकिन दुर्भाग्यवश २३ मई १८५८ को कालपी भी स्वातंत्र्य सैनिको के हाथ से निकल गई। बरजीरसिंह ने अब झाँसी-कालपी मार्ग के प्रमुख ठिकानो के स्वतंत्रता प्रेमियो को संगठित करके अंग्रेजो की नींद हराम कर दी। उन्होंने अपने साथियों गंभीर सिंह तथा देवीसिंह मोठ के साथ ब्रिटिशों के ठिकानो पर हमले शुरू कर दिए।

उधर झाँसी की रानी ने ग्वालियर पर कब्ज़ा कर अंग्रेजो को करारा तमाचा लगाया तो इधर बरजीरसिंह ने अंग्रेजो के ठिकानो को कब्जे में लेना शुरू कर दिया। कालपी के बाद बिलायाँ गढ़ी क्रांतिकारियों का केंद्र बन गई।झाँसी के क्रन्तिकारी काले खां,बरजीरसिंह,दौलतसिंह,गंभीरसिंह तथा देवीसिंह के साथ साथ सैदनगर,कोंटरा,संवढा,भांडेर आदि अनेक स्थानों के सैंकड़ो स्वतंत्रता प्रेमी बिलायाँ में एकत्रित हो गए।३१ मई १८५८ को मेजर ओर के नेतृत्व में एक बड़ी सेना ने बिलायाँ गढ़ी पर आक्रमण कर दिया। ब्रिटिशो की तोपों ने गढ़ी पर गोलीबारी शुरू की तो बरजीरसिंह घोड़े पर सवार होकर तथा ध्वज लेकर अपने साथियों सहित मैदान में आ डटे।

क्रांतिवीरो ने भीषण युद्ध किया। इस युद्ध में अंग्रेजो को बुरी तरह से रौंदते हुए बरजीर सिंह भी घायल हो गए। तब उनके कुछ साथी उन्हें अश्व से उतारकर वेतवा की ओर ले गए तथा एक साथी मोती गुर्जर ,,बरजीर सिंह के घोड़े पर ध्वज लेकर युद्ध में सन्नध हो गया। अंग्रेजो को बरजीरसिंह के निकलने का पता भी न चला। स्वातंत्र्यवीरो ने गोरो की सेना से जमकर लोहा लिया। अंत में मोती गुजर व अन्य ३४ सैनिको को बंदी बना लिया गया। इस युद्ध में लगभग १५० क्रांतिकारी शहीद हुए। मोती गुर्जर को अंग्रेजो ने फांसी पर लटका दिया। बरजीरसिंह ने कुछ ही दिनों में स्वस्थ होलर अंग्रेजो का पुनः विरोध शुरू कर दिया।

बरजीरसिंह अब तात्या तोपे के दाहिने हाथ बन गए।तात्या के उस क्षेत्र से दूर जाने के बाद उस क्षेत्र में क्रांति की गतिविधियों की बाग़डोर अब बरजीरसिंह ने संभाल ली। उन्होंने अंग्रेजो के साथ छुटपुट लड़ाईयाँ लड़ते हुए संघर्ष जारी रखा। २ अगस्ट १८५८ को क्रांति सेना ने उनके नेतृत्व में जालौन ले अंग्रेज समर्थक शासक को हटाकर जालौन पर अधिकार कर लिया। बरजीरसिंह की सेना और अंग्रेजो के युद्ध में ४ सितम्बर १८५८ को महू-मिहौनी तथा ५ सितम्बर को सरावन-सहाव की लड़ाई विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन लड़ाईयो में स्वतंत्रता प्रेमियों ने अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए।अंग्रेजी शासको ने उन्हें मारने या पकड़ने के अनेक प्रयास किए लेकिन वे जीवनभर विदेशियों की पकड़ में नहीं आये। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे अपनी बहन के पास पालेरा(जिला टिकमगढ़,म.प्र.)चले गए जहाँ १८६९ में उनका निधन हो गया।बरजीरसिंह की स्मृति में बिलायाँ में १९७२ में एक स्मारक बनाया गया जो आज भी मौजूद है।

सन्दर्भ-

१)सदर लेख सनावद,मध्य प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका "#प्रतापवाणी" के मई-जून २०१० के महाराणा प्रताप विशेषांक से लिया गया है।

नोट:credits to anonymous writer.

अशोक चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल शांति स्वरूप राणा Shanti swaroop rana,Ashok chakra winner soldier

====अशोक चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल शांति स्वरूप् राणा====
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जीवन परिचय----
स्वर्गीय Col शांति स्वरुप राणा जी का जन्म 17 सितम्बर 1949 में होशियपुर पंजाब के baila नामक गाँव में हुआ था।वे चार भाइयो और तीन बहनो में सबसे छोटे थे।उनके पिता जी बड़े प्रभावशाली जमीदार थे।
11 जून 1977 को उन्हें भारतीय सेना में कमीशन मिला था।

वीरता और सर्वोच्च बलिदान----------

शुरुआत में शांति स्वरुप राणा जी की नियुक्ति सेना में सिग्नल सैनिक के पद पर हुआ था लेकिन प्रतिभा के बल पर बाद में ये आर्मी कैडेट कॉलेज देहरादून में अधिकारी की ट्रेनिंग के लिए सेना की तरफ से चुने गए। ट्रेनिंग पूरी हो जाने के बाद इन्हें 3 बिहार रेजिमेंट में 11 जुलाई 1977 को नियुक्त किया गया। ऑपरेशन राइनो , ऑपरेशन पवन , ऑपरेशन रक्षक जैसे बड़े सैन्य अभियानो में अपना जौहर दिखाने के कारण इन्हें 13 राष्ट्रिय राइफल में 2 IC के स्थान पर पदोन्नत किया गया। सन् 1994 को Lt COL के पद पर नियुक्त किया गया। 2 नवंबर 1996 को Lt Col राणा को जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा के हफरुदा जंगलों में दो आंतकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने की चुनोती मिली।

Lt. Col राणा वहाँ आतंकवादियों की छोटी छावनियों के समान चार छुपे हुए ठिकाने देखे जिनमे भारी असला और 800 kg विस्फोटक जमा था। lt.col राणा और उनके सैनिकों ने फुर्ती दिखाते हुए सीधे दुश्मनों की तरफ धावा बोला और ग्रेनेड से हमला करते हुये आतंकवादी बंकरों को एक एक कर ध्वस्त करने लगे।

तभी उनकी नजर एक और छुपे हुए आतंकवादी ठिकानों पर पड़ी , इसी समय अपने छावनी सामान बंकरों से आतंकवादियों ने दुबारा जवाबदारी देते हुए भारी गोला बारी की। Lt. Col. राणा ने अपने सैन्य दस्ते की कमान संभाली और उन बंकरों की तरफ कूच शुरू की और तीन हैण्ड ग्रेनेड उनमें फेंक दिए। तभी दो विदेशी भाड़े के आतंकी भारी गोली बारी करते हुए बंकर से बाहर निकले। Lt Col राणा ने उन्हें तुरन्त ही जवाबी हमले में मार गिराया तभी दूसरी तरफ से आतंकवादियों ने राणा को पीछे से गोली बारी कर बुरी तरह से घायल कर डाला।

बुरी तरह घायल होने के बावजूद col राणा अपनी टुकड़ी की होंसला अफजाही करते रहे और दुश्मनों पर भारी पड़े। तभी एक आतंकवादी उनकी टुकड़ी की तरफ भारी गोला बारी करते हुए लपका, कर्नल राणा ने बिना अपनी जान की परवाह करते हुए अपनी टुकड़ी की रक्षा के लिए उस आतंकवादी पर आमने सामने का धावा बोल दिया और उसे मार गिराया।
कर्नल राणा का शरीर गोलियों से बुरी तरह छलनी हो गया तथा वे और बुरी तरह से घायल हो गए और अंत में इस देह को त्याग कर शहीद हो गए।
राणा के सफल नेतृत्व और बलिदान के कारण वह भारतीय सैन्य अभियान सफल रहा और ना जाने कितने मासूम देश वासियों तथा सैनिकों का जीवन सुरक्षित हुआ।

समस्त भारतीय कर्नल शांति स्वरूप् राणा के इस योगदान को भुला नहीं सकता और समस्त राजपुत समाज उनके इस शौर्य पर गर्वान्वित महसूस करता है और अपनी श्रधांजलि अर्पित करता है। कर्नल राणा को उनके बलिदान के लिए भारत सरकार की तरफ से अशोक चक्र से नवाजा गया।
कर्नल शांति स्वरूप् राणा जी को शत शत नमन।
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Lieutenant Colonel Shanti Swarup Rana was commissioned on 11 June 1977 in the Bihar Regiment.

On 02 November 1996, Lt Col Swarup Rana while serving with 13 RR was entrusted with the task of destroying two terrorist camps in the Hephrude forest of Kupwara District in Jammu & Kashmir. He spotted four well fortified hideouts stocked heavily with arms and ammunition including tonnes of explosives. In a gallant and swift strike, he destroyed these hideouts. One more well concealed hideout came to his notice. During the action that followed, the terrorists resorted to heavy firing from their well fortified bunker. Lt Col Rana organised his troops, crawled towards the bunker and threw hand grenades inside. Two foreign mercenaries came out firing heavily. He killed both of them instantaneously.

Meanwhile, the terrorists seriously injured Lt Col Rana in heavy firing from another location. In spite of this, the gallant officer kept on boosting the morale of his soldiers. When one more terrorist advanced towards the soldiers, Lt Col Rana without caring for this own life, charged and killed him in a hand-to-hand encounter. In this action, this gallant officer sustained fatal bullet injuries and made the supreme sacrifice. Lt Col Rana displayed indomitable courage, patriotism and gallantry of the highest order. For this act of indomitable courage, Lt Col SS Rana was awarded the ASHOKA CHAKRA posthumously

Biodata

1. Rank & Name - Lt Col Shanti Swarup Rana, AC (Posthumously)

2. Unit/Regt - 13 RR Bn/BIHAR REGT

3. Name of Award - Ashok Chakra

4. Theatre of Ops - OP RAKSHAK

5. Year of Awards - 26 Jan 1997

6. City/ State of which belonged - Panchkula / Haryana

Reference----
1- http://en.m.wikipedia.org/wiki/Rashtriya_Rifles
2- http://en.m.wikipedia.org/wiki/Shanti_Swaroop_Rana
3-http://indian-martyr.blogspot.in/2011/11/lt-col-shanti-swarup-rana.html?m=1
4- https://books.google.co.in/books?id=MlAi5sWYOe8C&pg=PA113&lpg=PA113&dq=shanti+swarup+rana&source=bl&ots=8tuVq2ElBK&sig=0ggqq5oZvTucn9qfnAKgpAyAWSE

Wednesday, July 20, 2016

बाबा मतीजी मिन्हास,जो सर कटने पर भी गौरक्षा/ब्राह्मण कन्या की रक्षा के लिए विधर्मियों से लड़ते हुए शहीद हो गए,Baba mati ji minhas

RAJPUT LEGEND OF PUNJAB- "BABA MATI JI MINHAS"

बाबा मतीजी मिन्हास

ऐसी मिसाल पुरी दुनिया में मिलनी मुश्किल है,जब असहाय की पुकार सुनकर ओर धर्म युद्ध के लिए अपनी शादी अधूरी छोड़कर अपने जीवन की आहुती भेंट कर दी हो,  ऐसी मिसाल एक राजपूत ही पेश कर सकता है ! धन्‍य हों मतीजी मनहास जिनका सर काटने के बाद भी धड़ दुश्मनों के सर काटता रहा।

There are many sagas in rajput history singing glories of the brave men who kept fighting even after they were beheaded.  One of such sagas is of the Veer Baba Matiji Minhas.

बाबा मतीजी मिन्हास और उनके परिवार का इतिहास ----------

बीरम देव मिन्हास जी ने बाबर की इब्राहिम लोधी (जो की दिल्ली के तखत पर बैठा था ) के खिलाफ युद्ध में सहायता की थी ! इनका एक पुत्र श्री कैलाश देव पंजाब के गुरदासपुर के इलाके में बस गया ! कैलाश देव मिन्हास जी के दो पुत्र कतिजी और मतीजी जसवान ( दोआबा का इलाका जहां जस्वाल राजपूत राज करते थे) में  विस्थापित हो गए ! यहाँ पर दोनों भाई जस्वाल राजा की सरकार में ऊँचे ओधे पर काम करने लगगए ! जसवां के जसवाल राजपूत राजा ने इनकी बहादुरी और कामकाज को देख कर इनाम में जागीर दी , जो की होशिारपुर का हलटा इलाका है ! कहा जाता है की , मतिजी जो शादी का दिन था , और वह अपनी शादी में फेरे ले रहे थे ,तभी एक ब्राह्मण लड़की ने शादी में ही गुहार लगाई की उसका गाव मुस्लमान लुटेरे लूट रहे है , गऊ माता को काट रहे है , लड़कीओ को बेआबरु कर रहे है , गाव को तहस नहस कर रहे है ! मतिजी  ने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए , और एक सच्चे राजपूत की भांती आधे फेरे बीच में ही छोड़कर उन मुस्लमान लुटेरों को मार भगाया , लेकिन इस बीच एक दुश्मन के वार से उनका सर धड़ से अलग हो गया , लेकिन वह फिर भी बिना सर के ही उनसे लड़ते रहे , यह नज़ारा देख दुश्मन भागने लगे , मतिजी ने उनका कुछ दूर तक बिना सर के पीछा किया लेकिन वह सब मैदान छोड़ कर दौड़ गए !

बाबा मतीजी दरोली के स्थान पर वीर गति को प्राप्त हुए ! उनकी होने वाली पत्नी ( क्यूंकि शादी पूरी नही हुए थी ) श्रीमती सम्पूर्णि जी (जो की नारू राजपूत थी ) भी  उनके साथ ही अलग चिता में सती होगई ! क्युकी उनकी शादी अधूरी थी इस लिया उन्हें अलग चीता में बिलकुल मतीजी की चीता के साथ सती होने की अनुमति दी गई थी ! आज उन दोनो के स्थान दरोली में साथ साथ है जहां उन्हें अग्नि दी गई थी !

इस प्रकरण के बाद उनके भाई कतीजी ने अपनी जागीर को बदलवाकर  दरोली  ले ली थी , जहां उनके भाई शहीद हुए थे ! यह स्थान मन्हास राजपूतो के जठेरे/पितृ है , क्योंकी गुरु गोबिंद सिंह जी के समय में इस स्थान और आस पास के राजपूत परिवार सिक्ख बन गये थे , बिलकुल बाबा मतीजी और सम्पूर्णिजी की स्थान के साथ ही एक भवय गुरुद्वारा बाबा मतिजी के नाम से बनवाया गया है !

एक बात बताना चाहता हुँ खालसा साजना के 40 - 50 वर्षो तक सभी तख्तो के जनरल , शस्त्र विद्या सिखाने वाले , ज्यादातर बहादुरी और  मैदान ए जंग में जौहर दिखाने वाले राजपूत योद्धा ही थे ,यह जुझारूपन उन्हें विरासत में मिला था ! गतका , शस्त्र विद्या , घुड़सवारी उनके पूर्वज हज़ारो साल से करते थे  ,और यह सब  उनके खून में ही था !

वैसे तो जठेरे/पितृ पूजन और सती पूजन सिक्ख धर्म में पूर्ण तरह मना है , लेकिन फिर भी हमारे सिक्ख राजपूत भाई आपने रीती रिवाज , और अपने राजपूत होने पर पूरा गर्व करते है और राजपूतो में ही शादी करवाते है !

जय क्षत्रिय धर्म  !!

जय राजपुताना  !!

Post credit---rajput of himalaya

Saturday, July 16, 2016

बिहार के शूरवीर क्षत्रिय राजपूत वंश (rajputs of bihar)

बिहार के क्षत्रिय राजपूत वंशो का विवरण--Rajputs of Bihar

बिहार -सदैव ही महानतम क्षत्रियों की भूमि रही है -जिस धरती पर त्रेतायुग ,द्वापरयग से लेकर कलयुग के 19 वी सदी तक कई महानतम क्षत्रिय वन्श व क्षत्रिय वीरों की राजधानी भी रही।
ये भूमि आज देश में मौजूद कई  क्षत्रियों (राजपूतों) के उत्तपति का गवाह भी रही है""।

आज जानते हैं बिहार के हर कोने कोने में फैलें कुछ प्रसिद्ध राजपूत शाखाएँ }
नीचे दिए सभी राजपूत वन्श बिहार के ज्यादातर जिलों में हैं यदि कोई शाखा विशेषतः यदि किसी जगह पर अधिक होगे तो उन स्थानों का नाम लिखा होगा।

नोट: जहाँ "शाहबाद" लिखु वहाँ भोजपुर,बक्सर,डुमराव,रोहतास,कैमुर जिला एक साथ होगे।
जहाँ "मगध" लिखु वहाँ औरन्गाबाद,गया,नवदा,अरवल,जहानाबाद जिला एक साथ होगा।

1.परमार
 उज्जैन (परमार)
 गढवरिया(परमार)
ये महानतम राजपूत वन्श बिहार के हर कोने मे अधिक संख्या में हैं ,इन तीन नामों से जाने जाते हैं।

________________________________
 2.सिकरवार
(शाहबाद, मगध,सारण में अधिक)

3.राठौर( मारवाड़ भी कहे जाते हैं)
(शाहबाद व शिवहर,मुज्जफरपर में अधिक)

4.बिसेन

5.गाई (बिसेन की शाखा)
(शाहबाद में मिलते हैं)

6.रघुवंशी
(सिवान, सारण में अधिक मिलते हैं)

7.गहलोत

8.शक्तावत/भनावत" शिशोदिया"
 (मगध में अधिक हैं खास करके औरन्गाबाद व गया में )

9.शिशोदिया

10.गहडवाल/गह्ढवाल/गहरवार

11. निकुम्भ

12.बुन्देला  
  (हजारीबाग व नवादा में गढ  हैं इनका)    

13.महरोड
(ज्यादातर शाहबाद में मिलते हैं)

14.चौहान

15.सोलंकी

16.सोनवान(सोलंकी)

17.बघेल (सोलंकी)

18.त्रिलोकचंदी (बैस)
 (शाहबाद,सितामढि में अधिक,  )

19.सिरमौर ( त्रिलोकचंदी बैस) अथवा प्राचीन मौर्य वंशी
  (मगध में मिलते हैं)।

20.जादोन

21.श्रीनेत(निकुम्भ की शाखा)
 (जमुइ ,बान्का में अधिक)
   
22.सान्ढा(भारद्वाज गोत्र)
  (रोहतास व मगध)

23.नरोनि (परिहार)प्रतिहार
 (शाहबाद )

24.परिहार प्रतिहार

25.तोमर

26.तिलोता(तोमर)

27.सोमवंशी(चन्द्रवंशी)

28.कन्दवार (गौतम की शाखा)
 (मगध में मिलते हैं)

29.सुरवार (गौड़ की शाखा)
(शाहबाद व शेखपुरा,सारण में अधिक)

30.काकन (सूर्यवंशी)
(शाहबाद में अधिक)

31.किनवार (दिखित) दीक्षित

32.कछ्वाह

33.कुरुवंशी (जरासन्ध का वंश,जिसने मगध पर 2800 वर्ष पूर्व तक राज किया था)
(शाहबाद,छपरा,मगध)

34.लोहतमिया

35.बराहिया(सेंगर)
(तिरहुट,मुन्गेर में अधिक  मिलते हैं)

36.सेंगर

37.हरिवोवंशी (हैहयवंशी राजपूत)
 (शाहबाद में मिलते हैं)

38.सूर्यवंशी (मूल सूर्यवंशी,प्राचीन पाल राजवंश इन्ही का साम्राज्य था)

39.भाटी
(भदावर गाँव भोजपुर)

40.गौतम

41.निमिवंशी (सूर्यवंशी)माता सीता का वंश

42.चन्देल

43.कर्मवार (गहरवार की शाखा)

44.बेरुवार (तोमर)
  (मिथिलान्चल क्षेत्र)

45.दोनवार (विशेन की शाखा)

46.देकहा

47.पालीवार/ल(चन्द्रवंशी)
(नार्थ बिहार के गोपालगंज में इनके गाँव हैं)

48.रक्सेल

49.बैस

50.नागवंशी (अधिकतर झारखण्ड में)

बिहार से शुद्ध मौर्य कुशवाह(कछवाहा) क्षत्रिय मालवा और पश्चिमी भारत में चले गए और जो बचे वो अवनत होकर कोइरी काछी और कुर्मियो में मिल गए,..
बिहार के राजपूत बाबूसाहेब/सिंह साहेब टाइटल से जाने जाते हैं और बिहार में शुद्ध राजपूतों की कुल संख्या बिहार की कुल जनसंख्या का 7% है इस प्रकार बिहार में लगभग 80 लाख शुद्ध राजपूत हैं जो यूपी के बाद सर्वाधिक हैं

जय बिहार
जय बाबू वीर कुवर सिंह जी"तेगवा बहादुर",जय आनन्द मोहन सिंह
लेखक--ठाकुर अमित सिंह उज्जैन (परमार)

Friday, July 15, 2016

शहीद उदासिंह राठौड़ जी,एक वीर सिख राजपूत यौद्धा

सिक्ख धर्म की स्थापना में राजपूतों का योगदान भाग-5

वीर सिक्ख राजपूत यौद्धा शहीद भाई ऊदा जी राठौड़ (रमाने राठौड़)

श्री गुरु तेगबहादुर जी की दिल्ली के चांदनी चौंक में हुई शहादत के पश्चात उनके पावन धड़ का अंतिम संस्कार भाई लक्खी राय जी ने अपने घर को आग लगाकर कर दिया गया ।
दूसरी तरफ भाई जैता जी गुरु साहिब के शीश को उठा के चल पड़े । रास्ते में उनके पिता भाई अाज्ञा जी,भाई नानू जी व भाई ऊदा जी उनसे आ मिले ।
ये चारों सिख दिन रात सफर करके श्री आनंदपुर साहिब पहुंचे ।
गुरु गोबिन्द सिंघ जी ने सभी को प्यार दिया व विशेष रूप से भाई जैता जी को रंघरेटा गुरु का बेटा कह के सम्मान दिया ।
भाई अाज्ञा जी व भाई जैता जी रंघरेटा जाति से संबंध रखते थे और दिल्ली निवासी थे ।
भाई नानू जी छींबा जाति से संबंध रखते थे और वो भी दिल्ली निवासी थे ।
भाई ऊदा जी राठौड़ राजपूत घराने से संबंध रखते थे और उनकी शाखा "रमाने" थी ।
भाई ऊदा जी का जन्म राव खेमा चंदनीया जी के घर 14 जून 1646 ईस्वी को हुआ ।
आप राव धर्मा जी राठौड़ के पोते व राव भोजा जी राठौड़ के पड़पोते थे ।
आप की उस्ताद भाई बज्जर सिंघ जी राठौड़ के साथ भी रिश्तेदारी थी क्योंकि "उदाने" व "रमाने" दो सगे भाईयों राव ऊदा जी राठौड़ व राव रामा जी राठौड़ के वंशज हैं ।
भाई ऊदा जी, गुरु गोबिन्द सिंघ जी व सिख सेना द्वारा लड़े गये भंगाणी के युद्ध में 18 सितंबर 1688 को शहीद हुए थे । उनके साथ गुरु गोबिन्द सिंघ जी की बुआ बीबी वीरो जी के सुपुत्र भाई संगो शाह जी व भाई जीत मल जी एवं राव माई दास जी पंवार के पुत्र भाई हठी चंद भी शहीद हुए थे ।
भाट बहियों/ख्यातों में उनकी शहीदी का जिक्र है-

"ऊदा बेटा खेमे चंदनिया का पोता धरमे का पड़पोता भोजे का, सूरज बंसी गौतम गोत्र राठौड़ रमाना, गुरु की बुआ के बेटे संगो शाह, जीत मल बेटे साधु के पोते धरमे खोसले खत्री के गैल रणभूमि में आये । साल सत्रह सै पैंतालीस असुज प्रविष्टे अठारह, भंगाणी के मल्हान, जमना गिरि के मध्यान्ह ,राज नाहन, एक घरी दिहुं खले जूझंते सूरेयों गैल साह्मे माथे जूझ कर मरा । गैलों हठी चंद बेटा माई दास का, पोता बल्लू राय का, चन्द्र बंसी, भारद्वाज गोत्र,पंवार,  बंस बींझे का बंझावत, जल्हाना, बालावत मारा गया ।"
    (भाट बही मुलतानी सिंधी, खाता रमानों का)

भाई ऊदा जी सूर्यवंशी राठौड राजपूत वंश के शासक वर्ग से संबंध रखते थे। वो मारवाड के राठौड राजवंश के वंशंज थे --
**वंशावली**
राव सीहा जी
राव अस्थान
राव दुहड
राव रायपाल
राव कान्हापाल
राव जलहनसी
राव छाडा जी
राव टीडा
राव सल्खो
राव वीरम देव
राव चूंडा
राव रिडमल
राव लाखा (राव जोधा के भाई)
राव जौना
राव रामजी
राव सल्हा जी
राव नाथू जी
राव रामा जी
राव रणमल जी
राव भोजा जी
राव धर्मा जी
राव प्रेमा चंदनिया जी
भाई ऊदा जी

लेखक---श्री सतनाम सिंह जी (ग्रेटर कैलाश)