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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Thursday, June 11, 2015

KRANTIKARI RAM PRASAD BISMIL

महान क्रांति कारी राम प्रसाद बिस्मिल जी की जीवनी




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-महान क्रांतिकारी अमर शहीद रामप्रसाद तोमर 'बिस्मिल'-
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====वंश परिचय====
राम प्रसाद तोमर 'बिस्मिल' मशहूर क्रांतिकारी नेता, स्वतंत्रता सेनानी, विचारक, शायर और साहित्यकार थे। उनका जन्म 11 जून, 1889 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में ठाकुर मुरलीधर सिंह तोमर के यहाँ हुआ था। उनका पैतृक गाँव मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के तोमरधार में बरबई था। तोमरधार में चम्बल नदी के किनारे रूहर तथा बरबई नाम के ये दो गांव अपनी उद्दंडता के लिए आज भी प्रसिद्ध हैं। भूपसिंह, तात्या, मानसिंह आदि प्रसिद्ध डाकू यहीं के निवासी थे। इन गाँवों के निवासी हमेशा अंग्रेजो को परेशान करते रहते थे।  रामप्रसाद जी बिस्मिल के पूर्वज इन्हीं गांवों के निवासी थे । इन के दादा जी अमानसिंह, समानसिंह और नारायणसिंह - ये तीनों सगे भाई थे और तोमर राजपूत थे। उनका ' वंश-वृक्ष ' निम्न है -

ठा .अमान सिंह                      समान सिंह      

  नारायण सिंह
         ।
    राजाराम सिंह
         ।
    करन सिंह --------------------  भीकम सिंह** --------------   कोक सिंह**
                          ** (जब पुस्तक प्रकाशित हुई 1996तब दोनों जीवित ऐसा उल्लेख )
                                             ।
                              नारायण सिंह (दादा जी )
                           श्रीमती विचित्रा देवी ( दादी जी )
                                            ।
ठा .मुरलीधर सिंह -----------------------------------------ठा .कल्याणमल सिंह
          ।
राम प्रसाद सिंह ( बिस्मिल )-----रमेश सिंह** ---------श्रीमती शाश्त्री देवी
                                   **सुशीलचंद्र (उपनाम )
 ग्राम -बरवाई ,तहसील -अम्बाह ,जिला मुरेना।

बिस्मिल के दादा नारायणसिंह कौटुम्बिक कलह और अपनी भाभी के असह्य दुर्व्यवहार से तंग आकर अपनी पत्नी और दो बेटों सहित घर से निकल गए और शाहजहांपुर आकर बस गए। वहॉ उनके आचार-विचार, सत्यनिष्ठा व धार्मिक प्रवृत्ति से स्थानीय लोग प्रायः उन्हें "पण्डित जी" कहते थे। साथ में वो कभी कभार पंडिताई का काम भी करने लगे। इससे वो पण्डित के रूप में मशहूर हो गए। उनका नाम भी नारायण सिंह की जगह नारायण लाल कहा जाने लगा।

=====रामप्रसाद बिस्मिल का प्रारम्भिक जीवन=====

राम प्रसाद बिस्मिल जी कम उम्र में ही आर्य समाज के प्रभाव में आ गए। योगाभ्यास और व्यायाम में उनकी गहरी रूची थी जिस वजह से उनके चेहरे से तेज झलकता था। कविताए लिखने पढ़ने का भी उनको शौक हो गया था। 18 साल की उम्र में उन्हें लाला हरदयाल के साथी क्रन्तिकारी स्वामी परमानन्द को फ़ासी की सजा होने का समाचार मिला जिससे उद्वेलित होकर उन्होंने एक कविता लिखी जिसमे अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ने का भाव था। उन्ही दिनों वो स्वामी परमानंद के सहयोगी स्वामी सोमदेव के संपर्क में आए और उन्हें वो कविता दिखाई। स्वामी सोमदेव ने उन्हें स्वाधीनता आंदोलन में उतरने की प्रेरणा दी।

उन दिनों लखनऊ में कांग्रेस का सम्मेलन हो रहा था जिसमे नरम दल वाले गरम दल द्वारा बाल गंगाधर तिलक का भव्य स्वागत करने का विरोध कर रहे थे। उन दिनों बिस्मिल जी भी लखनऊ में ही थे। उन्होंने नरम दल वालो और स्वागत समिती के अध्यक्ष पंडित जगतनारायण मुल्ला के विरोध को दरकिनार करते हुए युवाओ को इकठ्ठा कर तिलक जी का अभूतपूर्व स्वागत करवाया।

====मैनपुरी षड़यंत्र=====

सन 1915 में भाई परमानन्द की फाँसी का समाचार सुनकर रामप्रसाद ब्रिटिश साम्राज्य को समूल नष्ट करने की प्रतिज्ञा कर चुके थे, 1916 में एक पुस्तक छपकर आ चुकी थी, कुछ नवयुवक भी उनसे जुड़ चुके थे, स्वामी सोमदेव का आशीर्वाद भी उन्हें प्राप्त हो चुका था। अब तलाश थी तो एक संगठन की जो उन्होंने औरैया के पं॰ गेंदालाल दीक्षित के मार्गदर्शन में मातृवेदी के नाम से खुद खड़ा कर लिया था। इस संगठन की ओर से एक इश्तिहार और एक प्रतिज्ञा भी प्रकाशित की गयी। दल के लिये धन एकत्र करने के उद्देश्य से रामप्रसाद ने, जो अब तक 'बिस्मिल' के नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे, जून 1918 में दो तथा सितम्बर 1918 में एक - कुल मिलाकर तीन डकैती भी डालीं, जिससे पुलिस सतर्क होकर इन युवकों की खोज में जगह-जगह छापे डाल रही थी। 26 से 31 दिसम्बर 1918 तक दिल्ली में लाल किले के सामने हुए कांग्रेस अधिवेशन में इस संगठन के नवयुवकों ने चिल्ला-चिल्ला कर जैसे ही पुस्तकें बेचना शुरू किया कि पुलिस ने छापा डाला किन्तु बिस्मिल की सूझ बूझ से सभी पुस्तकें बच गयीं।

मैनपुरी षडयंत्र में शाहजहाँपुर से ६ युवक शामिल हुए थे जिनके नेता रामप्रसाद बिस्मिल थे किन्तु वे पुलिस के हाथ नहीं आये, तत्काल फरार हो गये। 1 नबम्बर 1919 को मजिस्ट्रेट बी॰ एस॰ क्रिस ने मैनपुरी षडयन्त्र का फैसला सुना दिया। जिन-जिन को सजायें हुईं उनमें मुकुन्दीलाल के अलावा सभी को फरवरी 1920 में आम माफी के ऐलान में छोड़ दिया गया। बिस्मिल पूरे 2 वर्ष भूमिगत रहे। उनके दल के ही कुछ साथियों ने शाहजहाँपुर में जाकर यह अफवाह फैला दी कि भाई रामप्रसाद तो पुलिस की गोली से मारे गये जबकि सच्चाई यह थी कि वे पुलिस मुठभेड़ के दौरान यमुना में छलाँग लगाकर पानी के अन्दर ही अन्दर योगाभ्यास की शक्ति से तैरते हुए मीलों दूर आगे जाकर नदी से बाहर निकले और जहाँ आजकल ग्रेटर नोएडा आबाद हो चुका है वहाँ के निर्जन बीहड़ों में चले गये। वहाँ उन दिनों केवल बबूल के ही बृक्ष हुआ करते थे; ऊसर जमीन में आदमी तो कहीं दूर-दूर तक दिखता ही न था।

====भूमिगत रहते हुए साहित्य सृजन====

पुलिस मुठभेड़ में बच निकलने के बाद वो यमुना के खादर में स्थित रामपुर जागीर गाँव में कुछ महीने रहे और गाय भैंस चराई और साथ में साहित्य सृजन किया। यह गाँव आज ग्रेटर नॉएडा के बीटा सेक्टर में आता है और वहॉ एक पार्क का नामकरण उनके नाम पर किया गया है।

उनकी यह खूबी थी की वो एक जगह ज्यादा दिन नही टिकते थे इसलिये कुछ दिन बाद वो अपनी बहन के गाँव कोसमा, जिला मैनपुरी चले गए और कई दिन वहॉ रहे लेकिन उनकी बहन भी उन्हें नही पहचान पाईं। उसके बाद बाह, पिनाहट होते हुए वो अपने पैतृक गाँव चम्बल के बरबई गए जहाँ उन्होंने कई महीने तक किसान के रूप में रहकर हल चलाया लेकिन उनके परिवार के लोगो ही उन्हें पहचान नही पाए।

इस दौरान उन्होंने अनेक पुस्तको का सर्जन किया। उन्होंने अपना क्रान्तिकारी उपन्यास बोल्शेविकों की करतूत लिखा। यह उपन्यास मूलरूप से बांग्ला भाषा में लिखित पुस्तक निहिलिस्ट-रहस्य का हिन्दी - अनुवाद है जिसकी भाषा और शैली दोनों ही बड़ी रोचक हैं। अरविन्द घोष की एक अति उत्तम बांग्ला पुस्तक यौगिक साधन का हिन्दी - अनुवाद भी उन्होंने भूमिगत रहते हुए ही किया था। इसके अलावा 1918 में प्रकाशित अँग्रेजी पुस्तक दि ग्रेण्डमदर ऑफ रसियन रिवोल्यूशन का हिन्दी - अनुवाद किया। उनके सभी साथियों को यह पुस्तक बहुत पसन्द आयी। इस पुस्तक का नाम उन्होंने कैथेराइन रखा था। इतना ही नहीं, बिस्मिल ने सुशीलमाला सीरीज से कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित कीं थीं जिनमें मन की लहर नामक कविताओं का संग्रह, कैथेराइन या स्वाधीनता की देवी - कैथेराइन ब्रश्कोवस्की की संक्षिप्त जीवनी, स्वदेशी रंग व उपरोक्त बोल्शेविकों की करतूत नामक उपन्यास प्रमुख थे।

=====आंदोलन में वापसी=====

सरकारी एलान के बाद बिस्मिल जी शाहजहाँपुर वापिस आ गए और एक कंपनी में मेनेजर की नौकरी करने लगें। इस दौरान उन्होंने अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया जिसमे वो देशभर के नेताओ के साथ मंच पर बैठे। इसमें उन्होंने असहयोग आंदोलन की घोषणा कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने युवाओ का नेतृत्व किया और युवाओ के आगे गांधी जी की एक ना चली जो इसके विरोध में थे। फलस्वरूप गांधी जी बहुत नाराज हुए और नेहरू को इन युवाओ का साथ देने के लिये डांटा भी।

चौरी चौरा काण्ड के बाद गांधी जी ने बिना किसी से सलाह लिये तानाशाही दिखाते हुए खुद ही असहयोग आंदोलन को खत्म करने का ऐलान कर दिया। बिस्मिल जी इससे बहुत गुस्सा हुए और उन्होंने गया अधिवेशन में युवाओ के साथ गांधी जी का विरोध किया लेकिन गांधी जी नही माने। इसके बाद कांग्रेस में बटवारा हो गया। चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी बना ली तो बिस्मिल के नेतृत्व में युवाओ ने एक क्रनीतिकारी दल का गठन किया।

==हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (एच आर ए) का गठन==

सितम्बर १९२३ में हुए दिल्ली के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में असन्तुष्ट नवयुवकों ने यह निर्णय लिया कि वे भी अपनी पार्टी का नाम व संविधान आदि निश्चित कर राजनीति में दखल देना शुरू करेंगे अन्यथा देश में लोकतन्त्र के नाम पर लूटतन्त्र हावी हो जायेगा। सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी लाला हरदयाल, जो उन दिनों विदेश में रहकर हिन्दुस्तान को स्वतन्त्र कराने की रणनीति बनाने में जुटे हुए थे, राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में स्वामी सोमदेव के समय से ही थे। लाला जी ने ही पत्र लिखकर राम प्रसाद बिस्मिल को शचींद्रनाथ सान्याल व यदु गोपाल मुखर्जी से मिलकर नयी पार्टी का संविधान तैयार करने की सलाह दी। लाला जी की सलाह मानकर राम प्रसाद ने शचींद्रनाथ सान्याल के इलाहबाद स्थित घर जाकर पार्टी का संविधान तैयार किया।

नवगठित पार्टी का नाम संक्षेप में एच॰ आर॰ ए॰ रखा गया व इसका संविधान पीले रँग के पर्चे पर टाइप करके सदस्यों को भेजा गया। 3 अक्टूबर 1924 को इस पार्टी (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन) की एक कार्यकारिणी-बैठक कानपुर में की गयी जिसमें शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेश चन्द्र चटर्जी व राम प्रसाद बिस्मिल आदि कई प्रमुख सदस्य शामिल हुए। इस बैठक में पार्टी का नेतृत्व बिस्मिल को सौंपकर सान्याल व चटर्जी बंगाल चले गये। पार्टी के लिये फण्ड एकत्र करने में कठिनाई को देखते हुए आयरलैण्ड के क्रान्तिकारियों का तरीका अपनाया गया और पार्टी की ओर से पहली डकैती 25 दिसम्बर 1924 (क्रिसमस की रात) को बमरौली में डाली गयी जिसका कुशल नेतृत्व बिस्मिल ने किया था। इसका उल्लेख चीफ कोर्ट आफ अवध के फैसले में मिलतादिया।

====काकोरी कांड====

पुलिस का दबाव पड़ने और पार्टी को फंड की कमी होने से  और भी कई डकैतियां रईस लोगो के यहाँ डाली गई जिसमे कई हत्याए होने पर बिस्मिल जी को बहुत ग्लानि हुई और उन्होंने अब से सिर्फ सरकारी खजाने को लूटने का निश्चय किया।

इसी उद्देश्य से शाहजहाँपुर में उनके घर पर 7 अगस्त 1925 को हुई एक इमर्जेन्सी मीटिंग में निर्णय लेकर योजना बनी और 9 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर रेलवे स्टेशन से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग, जिनमें अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी शर्मा (वास्तविक नाम मुरारी लाल गुप्त) तथा बनवारी लाल शामिल थे, 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए। इन सबके पास पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल भी थे जिनके बट में कुन्दा लगा लेने से वह छोटी आटोमेटिक राइफल की तरह लगता था और सामने वाले के मन में भय पैदा कर देता था। इन माउजरों की मारक क्षमता भी साधारण पिस्तौलों से अधिक होती थी। उन दिनों ये माउजर आज की ए॰ के॰ -47  रायफल की तरह चर्चित थे।

लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। उसे खोलने की कोशिश की गयी किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गये। मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश माउजर का ट्रिगर दबा दिया जिससे छूटी गोली अहमद अली नाम के मुसाफिर को लग गयी। वह मौके पर ही ढेर हो गया। शीघ्रतावश चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गयी। अगले दिन अखबारों के माध्यम से यह खबर पूरे संसार में फैल गयी। ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया और डी॰ आई॰ जी॰ के सहायक (सी॰ आई॰ डी॰ इंस्पेक्टर) मिस्टर आर॰ ए॰ हार्ट के नेतृत्व में स्कॉटलैण्ड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को इसकी जाँच का काम सौंप दिया।

चादर पर लगे धोबी के निशान से पुलिस रामप्रसाद बिस्मिल तक पहुँच गई और उनको गिरफ्तार कर लिया। इस सिलसिले में करीब 40 लोगो को गिरफ्तार किया गया जबकि सिर्फ 10 लोग इसमें शामिल थे। जिनका घटना से बिलकुल भी सम्बन्ध नही था उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया।

इस ऐतिहासिक मुकदमे में सरकारी खर्चे से हरकरननाथ मिश्र को क्रान्तिकारियों का वकील नियुक्त किया गया जबकि जवाहरलाल नेहरू के रिश्ते में साले लगने वाले सुप्रसिद्ध वकील जगतनारायण 'मुल्ला' को बहुत बड़ी रकम खर्च कर एक सोची समझी रणनीति के अन्तर्गत सरकारी वकील बनाया गया। जगत नारायण ने अपनी ओर से सभी क्रान्तिकारियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने में कोई कसर बाकी न रक्खी। यह वही जगत नारायण थे जिनकी मर्जी के खिलाफ बिस्मिल ने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की भव्य शोभायात्रा पूरे लखनऊ शहर में निकाली थी। इसी बात से चिढ़ कर मैनपुरी षडयंत्र में भी इन्हीं मुल्लाजी ने सरकारी वकील की हैसियत से काफी जोर लगाया परन्तु वे राम प्रसाद बिस्मिल का एक भी बाल बाँका न कर पाये क्योंकि मैनपुरी षडयन्त्र में बिस्मिल फरार हो गये थे और दो साल तक पुलिस के हाथ ही न आये। डिफेन्स के लिये भी एक डिफेन्स कमिटी बनाई गई जिसमे गोबिंद बल्लभ पंत जैसे लोग शामिल थे।

6 अप्रैल 1929 को विशेष सेशन जज ए० हैमिल्टन ने 115 पृष्ठ के निर्णय में प्रत्येक क्रान्तिकारी पर लगाये गये आरोपों पर विचार करते हुए लिखा कि यह कोई साधारण ट्रेन डकैती नहीं, अपितु ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की एक सोची समझी साजिश है। हालाँकि इनमें से कोई भी अभियुक्त अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये इस योजना में शामिल नहीं हुआ परन्तु चूँकि किसी ने भी न तो अपने किये पर कोई पश्चाताप किया है और न ही भविष्य में इस प्रकार की गतिविधियों से स्वयं को अलग रखने का वचन दिया है अतः जो भी सजा दी गयी है सोच समझ कर दी गयी है और इस हालत में उसमें किसी भी प्रकार की कोई छूट नहीं दी जा सकती। फिर भी, इनमें से कोई भी अभियुक्त यदि लिखित में पश्चाताप प्रकट करता है और भविष्य में ऐसा न करने का वचन देता है तो उनकी अपील पर अपर कोर्ट विचार कर सकती है।

फरार क्रान्तिकारियों में अशफाक उल्ला खाँ और शचीन्द्र नाथ बख्शी को बहुत बाद में पुलिस गिरफ्तार कर पायी। स्पेशल जज जे॰ आर॰ डब्लू॰ बैनेट की अदालत में काकोरी कांस्पिरेसी का सप्लीमेण्ट्री केस दायर किया गया और 13 जुलाई 1929 को यही बात दोहराते हुए अशफाक उल्ला खाँ को फाँसी तथा शचीन्द्रनाथ बख्शी को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी। सेशन जज के फैसले के खिलाफ 18 जुलाई 1929 को अवध चीफ कोर्ट में अपील दायर की गयी। चीफ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर लुइस शर्ट और विशेष न्यायाधीश मोहम्मद रज़ा के सामने दोनों मामले पेश हुए। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी पैरवी खुद की।

बिस्मिल ने चीफ कोर्ट के सामने जब धाराप्रवाह अंग्रेजी में फैसले के खिलाफ बहस की तो सरकारी वकील मुल्ला जी बगलें झाँकते नजर आये। ये मुल्ला जी वो ही है जिनकी पुस्तको का आज भी कानून के क्षेत्र में संविधान के बाद सबसे ज्यादा महत्व है। जब भी सुप्रीम कोर्ट के जजो को भी किसी विषय पर संशय होता है तो वो मुल्ला को ही कंसल्ट करते है।

बिस्मिल की इस तर्क क्षमता पर चीफ जस्टिस लुइस शर्टस को उनसे यह पूछना पड़ा - "मिस्टर रामप्रसाड! फ्रॉम भिच यूनीवर्सिटी यू हैव टेकेन द डिग्री ऑफ ला?" (राम प्रसाद! तुमने किस विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री ली?) इस पर उन्होंने हँस कर कहा था- "एक्सक्यूज मी सर! ए किंगमेकर डजन्ट रिक्वायर ऐनी डिग्री।" (क्षमा करें महोदय! सम्राट बनाने वाले को किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं होती।)

अदालत ने इस जवाब से चिढ़कर बिस्मिल द्वारा 18 जुलाई 1929 को दी गयी स्वयं वकालत करने की अर्जी खारिज कर दी। उसके बाद उन्होंने 16 पृष्ठ की तर्कपूर्ण लिखित बहस पेश की। उसे पढ़ कर जजों ने यह शंका व्यक्त की कि यह बहस बिस्मिल ने स्वयं न लिखकर किसी विधिवेत्ता से लिखवायी है। आखिरकार अदालत द्वारा उन्हीं लक्ष्मीशंकर मिश्र को बहस करने की इजाजत दी गयी जिन्हें लेने से बिस्मिल ने मना कर दिया था।

पण्डित जगतनारायण मुल्ला सरकारी वकील के साथ उर्दू के शायर भी थे। उन्होंने अभियुक्तों के लिये "मुल्जिमान" की जगह "मुलाजिम" शब्द बोल दिया। फिर क्या था, पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने तपाक से उन पर ये चुटीली फब्ती कसी: "मुलाजिम हमको मत कहिये, बड़ा अफ़सोस होता है; अदालत के अदब से हम यहाँ तशरीफ लाये हैं। पलट देते हैं हम मौजे-हवादिस अपनी जुर्रत से; कि हमने आँधियों में भी चिराग अक्सर जलाये हैं।" उनके कहने का मतलब था कि मुलाजिम वे (बिस्मिल) नहीं, बल्कि मुल्ला जी हैं जो सरकार से तनख्वाह पाते हैं। वे (बिस्मिल आदि) तो राजनीतिक बन्दी हैं अत: उनके साथ तमीज से पेश आयें। इसके साथ ही यह चेतावनी भी दे डाली कि वे समुद्र की लहरों तक को अपने दुस्साहस से पलटने का दम रखते हैं; मुकदमे की बाजी पलटना कौन सी बड़ी बात है? भला इतना बोलने के बाद किसकी हिम्मत थी जो बिस्मिल के आगे ठहरता। मुल्ला जी को पसीने छूट गये और वे चुपचाप पिछले दरवाजे से खिसक लिये। फिर उस दिन उन्होंने कोई जिरह नहीं की।

=====सजा=====

चीफ कोर्ट में शचीन्द्र नाथ सान्याल, भूपेन्द्र नाथ सान्याल व बनवारी लाल जिन्होंने मांफी मांग ली थी को छोड़कर शेष सभी क्रान्तिकारियों ने अपील की थी। 22 अगस्त 1929 को जो फैसला सुनाया गया उसके अनुसार राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, अशफाक उल्ला खाँ व ठाकुर रोशन सिंह को कड़ी कैद और फांसी की सजा दी गई।

चीफ कोर्ट का फैसला आते ही समूचे देश में सनसनी फैल गयी। ठाकुर मनजीत सिंह राठौर ने सेण्ट्रल लेजिस्लेटिव कौन्सिल में काकोरी काण्ड के सभी फाँसी (मृत्यु-दण्ड) प्राप्त कैदियों की सजायें कम करके आजीवन कारावास में बदलने का प्रस्ताव पेश करने की सूचना दी। कौन्सिल के कई सदस्यों ने सर विलियम मोरिस को, जो उस समय संयुक्त प्रान्त के गवर्नर थे, इस आशय का एक प्रार्थना-पत्र भी दिया किन्तु उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया।

सेण्ट्रल कौन्सिल के 18 सदस्यों ने तत्कालीन वायसराय व गवर्नर जनरल एडवर्ड फ्रेडरिक लिण्डले वुड को शिमला में हस्ताक्षर युक्त मेमोरियल भेजा जिस पर प्रमुख रूप से पं॰ मदन मोहन मालवीय, मोहम्मद अली जिन्ना, एन॰ सी॰ केलकर, लाला लाजपत राय, गोविन्द वल्लभ पन्त, आदि ने हस्ताक्षर किये थे किन्तु वायसराय पर उसका भी कोई असर न हुआ। पंडित मदन मोहन मालवीय पांच सदस्य प्रतिनिधिमंडल लेकर वाइसराय से मिलने भी गए लेकिन कोई असर ना हुआ।

अन्ततः बैरिस्टर मोहन लाल सक्सेना ने प्रिवी कौन्सिल में क्षमादान की याचिका के दस्तावेज़ तैयार करके इंग्लैण्ड के विख्यात वकील एस॰ एल॰ पोलक के पास भिजवाये। परन्तु लन्दन के न्यायाधीशों व सम्राट के वैधानिक सलाहकारों ने उस पर बड़ी सख्त दलील दी कि इस षड्यन्त्र का सूत्रधार राम प्रसाद बिस्मिल बड़ा ही खतरनाक और पेशेवर अपराधी है। यदि उसे क्षमादान दिया गया तो वह भविष्य में इससे भी बड़ा और भयंकर काण्ड कर सकता है। उस स्थिति में सरकार को हिन्दुस्तान में शासन करना असम्भव हो जायेगा। इस सबका परिणाम यह हुआ कि प्रिवी कौन्सिल में भेजी गयी क्षमादान की अपील भी खारिज हो गयी।

===फासी===

16 दिसम्बर 1929 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय (अन्तिम समय की बातें) पूर्ण करके जेल से बाहर भिजवा दिया। 18 दिसम्बर 1929 को माता-पिता से अन्तिम मुलाकात की और सोमवार 19 दिसंबर 1929 को प्रात:काल 6 बजकर 30 मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। बिस्मिल के बलिदान का समाचार सुनकर बहुत बड़ी संख्या में जनता जेल के फाटक पर एकत्र हो गयी। जेल का मुख्य द्वार बन्द ही रक्खा गया और फाँसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया। शव को डेढ़ लाख लोगों ने जुलूस निकाल कर पूरे शहर में घुमाते हुए राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उसका अन्तिम संस्कार कर दिया।

====शहादत का योगदान====

भारतवर्ष को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त कराने में यूँ तो असंख्य वीरों ने अपना अमूल्य बलिदान दिया परन्तु राम प्रसाद बिस्मिल एक ऐसे अद्भुत क्रान्तिकारी थे जिन्होंने अत्यन्त निर्धन परिवार में जन्म लेकर साधारण शिक्षा के बावजूद असाधारण प्रतिभा और अखण्ड पुरुषार्थ के बल पर एच आर ए के नाम से देशव्यापी संगठन खड़ा किया जिसमें एक से बढ़कर एक तेजस्वी व मनस्वी नवयुवक शामिल थे जो उनके एक इशारे पर इस देश की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन कर सकते थे।

बिस्मिल के साथ 3 क्रान्तिकारियो की शहादत ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। काकोरी काण्ड से उतपन्न परिस्थितियों ने स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा और दशा दी। पूरे देश में क्रन्तिकारी संगठनो का गठन होने लगा। राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथियो ने जो शुरुआत की, उसको भगत सिंह और चंद्रशेखर जैसे क्रान्तिकारियो ने आगे बढ़ाया।

===साहित्य और शायरी में योगदान===
बिस्मिल उच्च कोटि के शायर थे। शायरी के लिये वो बिस्मिल नाम के तखल्लुस का इस्तमाल करते थे। इस वजह से वो बिस्मिल नाम से ही प्रसिद्ध हो गए। उनकी लिखी हुई गजल सरफ़रोशी की तमन्ना सबसे मशहूर हुई जो स्वाधीनता आंदोलन के क्रान्तिकारियो के लिये मन्त्र बन गई। बिस्मिल ने ना केवल इसे लिखा बल्कि काकोरी काण्ड के मुक़दमे के दौरान अदालत में इसे अपने बाकी साथियो के साथ गाया भी। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्दे मातरम जैसे सुप्रसिद्ध गीत के बाद रामप्रसाद 'बिस्मिल' की यह  रचना सबसे प्रसिद्ध है, जिसे गाते हुए न जाने कितने ही देशभक्त फाँसी के तख्ते पर झूल गए।

----बिस्मिल के बारे में भगत सिंह और अन्य के विचार----

भगत सिंह ने राम प्रसाद बिस्मिल के बारे में लिखा है--"श्री रामप्रसाद 'बिस्मिल' बड़े होनहार नौजवान थे। गज़ब के शायर थे। देखने में भी बहुत सुन्दर थे। योग्य बहुत थे। जानने वाले कहते हैं कि यदि किसी और जगह या किसी और देश या किसी और समय पैदा हुए होते तो सेनाध्यक्ष बनते। आपको पूरे षड्यन्त्र का नेता माना गया। चाहे बहुत ज्यादा पढ़े हुए नहीं थे लेकिन फिर भी पण्डित जगतनारायण जैसे सरकारी वकील की सुध-बुध भुला देते थे। चीफ कोर्ट में अपनी अपील खुद ही लिखी थी, जिससे कि जजों को कहना पड़ा कि इसे लिखने में जरूर ही किसी बुद्धिमान व योग्य व्यक्ति का हाथ है।"

प्रसिद्ध विचारक रामविलास शर्मा बिस्मिल के बारे में लिखते हैँ--
ऐसे नौजवान कहाँ से मिल सकते हैं? आप युद्ध विद्या में बड़े कुशल हैं और आज उन्हें फाँसी का दण्ड मिलने का कारण भी बहुत हद तक यही है। इस वीर को फाँसी का दण्ड मिला और आप हँस दिये। ऐसा निर्भीक वीर, ऐसा सुन्दर जवान, ऐसा योग्य व उच्चकोटि का लेखक और निर्भय योद्धा मिलना कठिन है।' सन् 1922 से 1929 तक रामप्रसाद बिस्मिल ने एक लम्बी वैचारिक यात्रा पूरी की। उनके आगे की कड़ी थे भगतसिंह।"

ये दुर्भाग्यपूर्ण है की ज्ञापन और निवेदन कर के स्वाधीनता आंदोलन में योगदान देने वाले, अंग्रेज़ो के साथ मिलकर क्रान्तिकारियो का विरोध करने वाले के चित्र नोटों पर छपते हैँ, उनके वंशज आज तक देश पर राज कर रहे हैँ जबकि देश के लिये अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले बिस्मिल जी के परिवारजन उनके पैतृक गाँव बरबई में बहुत साधारण जिंदगी बिता रहे है और उनके परिवार की बेटियो की शादी तक के लिये सामाजिक संस्थाओ से दान लेना पड़ता है।

रामप्रसाद बिस्मिल तंवर राजपूत थे,
जिनका बिना शोध किये लेखको ने ब्राह्मण बना डाला !
इनका नाम रामप्रसाद सिंह था इनके दादा नारायण सिंह तंवर मुरेना जिले के रूअर बरवाई गांव से थे !
इनके पिता मुरली सिंह का विवाह जोधपुरा गांव जिला आगरा के परिहारो के यहा हुवा !
बिस्मिल की बहिन शास्त्री देवी उतम नगर दिल्ली में रहती है जो कौशिमा मैनपुरी के जादवो को ब्याही थी !
बिस्मिल का भानजा हरिशचंदर सिंह उतम नगर दिल्ली में रहता है !
संकटकाल में नारायण सिंह जी ने गांव छोड़ दिया !
और नारायणदत नाम से मंदिर में रहने लगे !
इसी समय जलियावाला बाग हत्या कांड हुवा तब रामप्रसाद सिंह ने एक शेर लिखा ......!

" ये फ़क्त इस जुर्म से तुझको गाफिल क्या मिला।
नीम ' बिस्मिल ' छोड़ने से तुझको हासिल क्या मिला।"

इसी समय रामप्रसाद सिंह बिस्मिल के नाम से जाने-जाने लगे !

ऐसे महान क्रांतिकारी, विचारक, नेता, महान स्वतंत्रता सेनानी को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन_/\_ऐसे महान क्रांतिकारी, विचारक, नेता, महान स्वतंत्रता सेनानी को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन

1 comment:

  1. Please provide some reference from any book.. as per modern history he belongs to a Brahmin Family in Sahajahanpur Uttar Pradedh.. Awaiting

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