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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Monday, June 8, 2015

PIRU SINGH SHEKHAWAT JI





शहीद कंपनी हवलदार मेजर (CHM) पीरू सिंह शेखावत
परमवीर चक्र (मरणोपरांत)
20 मई 1918 - 18 जुलाई 1948
यूनिट - 6 राजपूताना रायफल्स
लड़ाई - टीथवाल की लड़ाई
युद्ध - भारत - पाक कश्मीर युद्ध 1947-48



======जन्म=======

CHM पीरू सिंह का जन्म 20 मई 1918 को गाँव रामपुरा बेरी, (झुँझुनू) राजस्थान में हुआ | वह 20 मई 1936 को 6 राजपुताना रायफल्स में भर्ती हुए |
======वीरगाथा=====

1948 की गर्मियों में जम्मू & कश्मीर ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तानी सेना व कबाईलियों ने संयुक्त रूप से टीथवाल सेक्टर में भीषण आक्रमण किया | इस हमले में दुशमन ने भारतीय सेना को किशनगंगा नदी पर बने अग्रिम मोर्चे छोड़ने पर मजबूर कर दिया | इस झटके के बाद भारतीय सेना ने टीथवाल पहाड़ी पर मोर्चा संभाल लिया |

इस परिस्थिति में इस सेक्टर में आसन्न हमलों को देखते हुए 163 ब्रिगेड को मजबूती देने के लिए 6 राजपुताना रायफल्स ने उरी से टीथवाल की तरफ कूच किया | भारतीय हमले 11 जुलाई 1948 को शुरू हुए | यह ऑपरेशन 15 जुलाई तक अच्छी तरह जारी रहे | इस इलाके में दुश्मन एक ऊँची पहड़ी पर काबिज था, अत: आगे बढ़ने के लिए उस जगह पर कब्जा करना बहुत ही आवश्यक था | उस के नजदीक ही दुश्मन ने एक और पहाड़ी पर बहुत ही मजबूत मोर्चाबंदी कर रखी थी | 6 राजपुताना रायफल्स को इन दोनों पहाड़ी मोर्चों पर फिर से काबिज होने का विशेष काम दिया गया |

6 राजपुताना रायफल्स की "D" कंपनी को पहले अपने लक्ष्य पर हमला कर वहां ये दुश्मन को खदेड़ना था | जबकि "C" कंपनी को अपने लक्ष्य पर तब हमला करना था, जब "D" कंपनी अपने लक्ष्य पर अच्छी तरह काबिज हो जाए | "D" कंपनी ने 18 जुलाई 1948 को दोपहर 1:30 बजे अपने लक्ष्य पर हमला किया | उस पोस्ट की तरफ जाने वाला रास्ता लगभग मात्र एक मीटर ही चौड़ा था, व इस के दूसरी तरफ गहरे खतरनाक दर्रे थे | यह संकरा रास्ता दुश्मन के गुप्त बंकरों की जद में भी था | इस रास्ते में आगे बढ़ने पर "D" कंपनी दुश्मन की भीषण गोलाबारी की चपेट में आ गई, व आधे घंटे में ही कंपनी के 51 सैनिक शहीद हो गए |
इस हमले के दौरान CHM पीरू सिंह इस कंपनी के अगुवाई करने वालों में से थे, जिस के आधे से ज्यादा सैनिक दुश्मन की भीषण गोलाबारी में मारे जा चुके थे | पीरू सिंह दुश्मन की उस मीडियम मशीन गन पोस्ट की तरफ दौड़ पड़े जो उन के साथियों पर मौत बरसा रही थी | दुश्मन के बमों के छर्रों से पीरू सिंह के कपड़े तार - तार हो गए व शरीर बहुत सी जगह से बुरी तरह घायल हो गया, पर यह घाव वीर पीरू सिंह को आगे बढ़ने से रोक नहीं सके | वह राजपुताना रायफल्स का जोशीला युद्धघोष " राजा रामचंद्र की जय" करते लगातार आगे ही बढ़ते रहे | आगे बढ़ते हुए उन्होनें मीडियम मशीन गन से फायर कर रहे दुश्मन सैनिक को अपनी स्टेन गन से मार डाला व कहर बरपा रही मशीन गन बंकर के पूरे crew को मार कर उस पोस्ट पर कब्जा कर लिया | तब तक उन के सारे साथी सैनिक या तो घायल होकर या प्राणों का बलिदान कर रास्ते में पीछे ही पड़े रह गए | पहाड़ी से दुश्मन को हटाने की जिम्मेदारी मात्र अकेले पीरू सिंह पर ही रह गई | शरीर से बहुत अधिक खून बहते हुए भी वह दुश्मन की दूसरी मीडियम मशीन गन पोस्ट पर हमला करने को आगे बढ़ते, तभी एक बम ने उन के चेहरे को घायल कर दिया | उन के चेहरे व आँखो से खून टपकने लगा तथा वह लगभग अँधे हो गए | तब तक उन की स्टेन गन की सारी गोलियां भी खत्म हो चुकी थी | फिर भी दुश्मन के जिस बँकर पर उन्होने कब्जा किया था, उस बँकर से वह बहादुरी से रेंगते हुए बाहर निकले, व दूसरे बँकर पर बम फेंके |
बम फेंकने के बाद पीरू सिंह दुश्मन केे उस बँकर में कूद गए व दो दुश्मन सैनिकों को मात्र स्टेन गन के आगे लगे चाकू से मार गिराया | जैसे ही पीरू सिंह तीसरे बँकर पर हमला करने के लिए बाहर निकले उन के सिर में एक गोली आकर लगी फिर भी वो तीसरे बँकर की तरफ बढ़े व उस के मुहाने पर गिरते देखे गए |
तभी उस बँकर में एक भयंकर धमाका हुआ, जिस से साबित हो गया की पीरू सिंह के फेंके बम ने अपना काम कर दिया है | परतुं तब तक पीरू सिंह के घावों से बहुत सा खून बह जाने के कारण वो शहीद हो गए | उन्हे कवर फायर दे रही "C" कंपनी के कंपनी कमांडर ने यह सारा दृश्य अपनी आँखों से देखा | अपनी विलक्षण वीरता के बदले उन्होने अपने जीवन का मोल चुकाया, पर अपने अन्य साथियों के समक्ष अपनी एकाकी वीरता, दृढ़ता व मजबूती का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया | इस कारनामे को विश्व के अब तक के सबसे साहसिक कारनामो में एक माना जाता है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन की 75 वर्षीय माता श्रीमती तारावती को लिखे पत्र में लिखा कि "देश कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह का मातृभूमि की सेवा में किए गए उनके बलिदान के प्रति कृतञ है, और हमारी ये प्रार्थना है की यह आप को कुछ शांति व सांत्वना दे सके |

अपनी प्रचंड वीरता, कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा और प्रेरणादायी कार्य के लिए कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह भारत के युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किए गए |


शूरां निपजै झुँझुनू लिंयां कफन नै साथ |

रण भूमि रा लाडला प्राण हथेली हाथ ||

भारतवर्ष की एकता और अखंडता पर प्राण न्यौछावर करने वाले भारत माँ के वीर सपूत को आज उन के जन्म दिवस पर शत्-शत् नमन ... _/\_
जय हिन्द!! जय जवान!!




English Translation :

*** BIRTH ANNIVERSARY ***
Shaheed CHM Peru Singh Shekhawat
Paramveer Chakra (P)
20 May 1918 - 18 July 1948
Unit - 6th Rajputana Rifles
Battle - Kashmir War 1947-48

Company Havildar Major Piru Singh,
was born on 20 May 1918 in village Rampura Beri Rajasthan. He was enrolled in the 6th
Rajputana Rifles on 20 May 1936.
During the Jammu & Kashmir
operations in summer of 1948,
Pakistani raiders mounted a strong
counter offensive in the Tithwal
sector. The enemy also forced the
Indian Army to vacate their forward
positions across river Kishanganga.
After the setback, Indian troops took
position on the Tithwal ridge. At this
juncture, 6 Rajputana Rifles was
moved from Uri to Tithwal to
strengthen the 163 Bde in its
impending offensive in the sector.
The Indian offensive commenced on
11 July 1948. The operation went on
well till July 15th. The recon reports,
however, revealed that the enemy
was holding a high feature in the
area and that its capture was
essential for making any further
progress. Further ahead lay another
feature also held in strength by the
enemy.
The 6th Rajputana Rifles was assigned
the task of securing these two
features. The 'D' Company was to
secure the first feature. The 'C'
Company was to capture the second
feature after the 'D' Company had
carried out its task. The 'D' Company
launched its attack on the objective
at 0130 hrs on July 18th. The path to
the objective was about one metre
wide with deep ravines on either
side. Overlooking this narrow path
were the hidden enemy bunkers. The
company was subjected to heavy fire
and with half an hour it suffered 51
casualties. During this battle, CHM
Singh was with the leading section of
the company, more than half of which
was mowed down by the devastating
fire of the enemy. He rushed forward
to deal with the enemy medium
machine gun post which was playing
havoc with his troops. Enemy
grenade splinters ripped open his
clothes and wounded several parts of
his body. But this did not deter him.
He still continued the advance,
shouting the Rajputana Rifles battle cry, "Raja
Ramchandra Ki Jai" . Rushing forward
he bayonetted the crew of the enemy
MMG, with his own sten gun,
silenced the menacing gun and
occupied the post. By this time all
his companions lay behind either
dead or wounded.
The responsibility of clearing the
enemy from the hill feature lay with
him alone. Bleeding profusely he
inched forward to attack the second
enemy MMG post. At this juncture a
grenade wounded him in the face.
The blood dripping from his face
almost blinded him. By now all the
sten gun ammunition with him had
been spent. He courageously crawled
out of the occupied enemy trench
and hurled grenades at the next
enemy post. CHM Singh then jumped
into another trench and bayonetted
two enemy soldiers to death. As CHM
Singh, emerged out of the second
trench to charge on the third enemy
bunker, he was hit in head by a
bullet and was seen dropping on the
edge of the enemy trench. There was
an explosion in the trench which
showed that the grenade had done
its work. By then CHM Piru Singh's
wound had proved fatal. "He paid
with his life for his singularity brave
act, but he left for the rest of his
comrades a unique example of
single-handed bravery and
determined cold courage. The
country is grateful," wrote Prime
Minister Jawaharlal Nehru to Mrs.
Tarawati, 75-year old mother of
Company Havildar Major Piru Singh,
"for this sacrifice made in the service
of the Motherland, and it is our
prayer that this may give you some
peace and solace." For his extreme valour, devotion to duty and inspiring act CHM Piru Singh was
honoured with the highest war-time
gallantry award, Param Vir Chakra,
posthumously.
Salute and respect to the real son of motherland on his birth anniversary ... _/\_
JAIHIND!! JAI JAWAN!!

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