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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Thursday, June 18, 2015

THE GREAT RAJPUT WARRIOR RAMSHAH TANWAR AND THE BATTLE OF HALDIGHATI

राजा रामशाह तंवर और हल्दीघाटी का युद्ध 

Rajputana Soch  राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास


मित्रों पिछली पोस्ट में हम तंवर/तोमर वंश की उत्पत्ति और इतिहास पर प्रकाश डाल चुके हैं,आज हम भारतवर्ष के इतिहास में महाभारत के बाद सबसे प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध में राजा रामशाह तंवर और उनके परिवार के महान बलिदान पर जानकारी देंगे.......

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हम पहले बता ही चुके हैं कि ग्वालियर पर मुगलों का अधिकार होने के बाद राजा रामशाह तंवर अपने परिवार और कुछ विश्वासपात्र सैनिको के साथ मेवाड़ आ गए थे,मेवाड़ में महाराणा प्रताप ने उनका स्वागत किया,राजा रामशाह तंवर के पुत्र शालिवाहन तंवर महाराणा प्रताप के बहनोई थे,
हल्दीघाटी के युद्ध से पूर्व की घटनाएँ-------

मुगल सम्राट अकबर ने धीरे धीरे पुरे उत्तर भारत पर अपना अधिकार कर लिया था,राजस्थान में भी आमेर,मारवाड़ जैसे बड़े राज्यों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी,परन्तु स्वाभिमानी महाराणा प्रताप ने बड़े प्रलोभनों और दबाव के बावजूद अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया ,
अकबर ने वर्ष 1576 इसवी की गर्मियों में मानसिंह और आसफखान को एक बड़ी सेना के साथ मेवाड़ पर हमला करने के लिए भेजा,
अकबर की इस योजना की सबसे पहले जानकारी कुम्भलगढ़ के रामशाह तंवर के सैनिक शिविर में पहुंची,उन्होंने तुरंत अपने पुत्र शालिवाहन को इसकी सूचना देने के लिए महाराणा प्रताप के पास भेजा ,प्रताप ने बिना विचलित हुए इस हमले की खबर सुनकर इसका सामना करने के लिए सब सरदारों को रामशाह की हवेली पर बुलाया,इस बैठक में राव संग्राम,कल्याण चूंडावत,बीदा झाला,भीम डोड,युवराज अमरसिंह,भामाशाह,हरदास चौहान आदि वीर एकत्रित हुए......

जब प्रताप हवेली में पहुंचे तो रामशाह तंवर ने उनका स्वागत किया और हवेली में आने का उपकार माना.युद्ध के विचार विमर्श में राजा रामशाह ने सलाह दी कि मुगलों को घाटी में आने दिया जाए और उन्हें घेर कर मारा जाए,पर युवा सरदारों ने इसका विरोध किया और आगे बढ़कर मैदान में लड़ने में शौर्य समझा,और राजा रामशाह के भयभीत होने का मजाक किया जो उन्हें अच्छा नहीं लगा.
अंत में प्रताप ने उचित जगह लड़ने का निर्णय लिया.

इस प्रकार जब मुगल सेना मेवाड़ पहुंची तो महाराणा और उनके वीर यौद्धा उसका सामना करने को तैयार हो गए

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हल्दीघाटी का विश्वप्रसिद्ध युद्ध


महराणा और उनके वीर यौद्धाओं की छोटी सी सेना अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित होकर देवताओं की स्तुति कर युद्ध के लिए निकलने लगी,रानियों ने उनकी आरती उतारी और इस प्रकार उनकी सेना ने कूच किया,मार्ग में पड़ने वाले गाँवो के लोगो ने उनका आदर सत्कार किया और स्त्रियों ने बधावा गीत गाए.लोह्सिंह गाँव होते हुए महाराणा प्रताप हल्दीघाटी पहुंचे जहाँ 18 जून 1576 को यह प्रसिद्ध युद्ध हुआ.
मेवाड़ की सेना के दायें कमान का नेत्रत्व राजा रामशाह तंवर कर रहे थे,उनके साथ उनके पुत्र शालिवाहन,भवानी सिंह,प्रतापसिंह,और पौत्र बलभद्र भी थे,बाई कमान का नेत्रत्व मानसिंह झाला कर रहे थे,हरावल में किशनदास चूंडावत,भीमसिंह डोडिया,रामदास राठौड़ आदि थे.
युद्ध से पूर्व रामशाह ने अपने पुत्रों समेत महाराणा का इस प्रकार अभिवादन किया जिस प्रकार महाभारत के युद्ध में द्रुपद अपने पुत्रों के साथ पांड्वो की सहायता में युद्ध करने आए थे.
युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व जैसे ही महाराणा का विजय निशान का हाथी घाटी से बाहर निकला,राजा रामशाह की सैन्य कमान ने हाथी से पीछे घाटी से निकलकर मुगल सेना की हरावल पर ऐसा भयंकर प्रहार किया मुग़ल सेना पीछे की और भाग खड़ी हुई,
इस भगदड़ में जब बदायुनी ने आसफ खान से पूछा कि हम शत्रु राजपूत और मुगलों के अधीन राजपूतों में फर्क कैसे करें?तो आसफ खान ने कहा कि तीर चलाते जाओ चाहे जिस और का भी राजपूत मरे,फायदा तो इस्लाम का ही है,
बदायुनी ने बाद में लिखा कि राजपूतों की भीड़ इतनी थी कि मेरा एक भी तीर ख़ाली नहीं गया,
पर आसफ खान भी राजपूतों के शौर्य के आगे ठहर न सका,महाराणा की हरावल ने मुगलों की हरावल को कुचल कर रख दिया,खुद महाराणा प्रताप के वार से शहजादा सलीम और मानसिंह मरने से बाल बाल बचे,मुगल सेनापति जगन्नाथ कछवाह भी बाल बाल बचा,हाथी की सूंड में बंधी तलवार से महाराणा प्रताप का घोडा चेतक भी घायल हो गया.

किन्तु दुर्भाग्य से मुगलों की दाई कमान के सैय्यद भागे नहीं बल्कि उन्होंने भी डटकर युद्ध किया,इसी समय मुगलों की अतिरिक्त सेना उनकी सहायता के लिए वहां पहुँच गयी और इस अतिरिक्त सेना से युद्ध का पासा ही पलट गया,खुद मुगलों ने यह झूठी अफवाह भी उडा दी कि स्वयं अकबर एक और बड़ी सेना लेकर पहुँचने ही वाला है.
शत्रु सेना कि संख्या कई गुनी देखकर राजपूत समझ गये कि अब विजय संभव नहीं है इसलिए भविष्य में संघर्ष जारी रखने के लिए पहले तो महाराणा को युद्ध भूमि से सुरक्षित जाने को बड़ी मुश्किल से तैयार किया गया,उसके बाद राजपूतो ने रणभूमि में आत्मबलिदान का निर्णय लिया.
कुंवर शालिवाहन ने अभिमन्यु सा युद्ध किया और अभिमन्यु की तरह ही उन्हें सैंकड़ो मुगलों ने घेर कर शहीद किया,इसके बाद राजा रामशाह घायल शेर की तरह मुगलों पर टूट पड़े और वीरता से लड़ते हुए रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए.रामशाह तंवर के दो अन्य पुत्र भानसिंह और प्रतापसिंह भी वीरगति को प्राप्त हुए,इस भीषण युद्ध में केवल बलभद्र ही घायल होकर बच सका,
इस युद्ध में बीदा झाला और मानसिंह झाला ने भी वन्दनीय त्याग किया,रामदास राठौड़,भीम सिंह डोडिया,देवीचंद चौहान,बाबु खंडेराव भदौरिया,दुर्गा तोमर आदि सैंकड़ो वीरो ने जिस पराक्रम से युद्ध कर अपना बलिदान दिया उससे राजपूतो और हिंदुत्व की कीर्ति आज भी चहुँ और फैली हुई है.

इतिहासकार और इस युद्ध में स्वयं भाग लेने वाला बदायुनी लिखता है कि अगर मुगलों की दाई कमान के सैय्यद भी बाकि मुगलों की तरह भाग पड़ते तो इस युद्ध में मुगलों की हार निश्चित थी,बदायुनी ने यह भी लिखा कि रामशाह तंवर महाराणा की सेना में सदैव आगे रहता था और इस युद्ध में उसने ऐसी प्रचंड वीरता दिखाई जिसका वर्णन करना असम्भव है,
इस युद्ध के दशकों बाद भी इसमें भाग लेने वाले मुग़ल सैनिक दक्षिण भारत में भी इस युद्ध की भीषणता और राजपूतों के शौर्य के किस्से सुनाया करते थे.

हल्दीघाटी के युद्धस्थल के रक्तताल में राजा रामशाह तंवर और कुंवर शालिवाहन तंवर की छत्र समाधियाँ आज भी विधमान हैं.............
हल्दीघाटी के सभी शहीदों को हमारा शत शत नमन,
जय राजपूताना.....................

सोर्स.................
1-उदयपुर राज्य का इतिहास गौरीशंकर ओझा
2-राजपूतों की गौरव गाथा लेखक--राजेन्द्र सिंह राठौड़ बीदासर

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