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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Friday, July 10, 2015

HARSHVARDHAN_THE GREAT BAINS RAJPUT RULER

***महान सम्राट हर्षवर्धन बैस(606-647)***



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मित्रो आज हम आपको बैस वंशी महान राजपूत सम्राट हर्षवर्धन बैस के बारे में बताएँगे। हर्षवर्धन ने छठी-सातवी शताब्दी में 41 साल तक लगभग पुरे उत्तर और मध्य भारत पर शासन किया। हर्षवर्धन के राज्य की सीमा एक समय उत्तर पश्चिम में पंजाब से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी और पूर्व में बंगाल और उड़ीसा तक फैली थी। गुप्त साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तर भारत छोटे छोटे राज्यो में विभाजित हो गया था। हर्षवर्धन ने इन सभी राज्यो को जीतकर एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। अपने अनेक गुणों के कारण हर्षवर्धन की गिनती भारतीय इतिहास के महान सम्राटों में होती है।

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**वंश परिचय**


हर्षवर्धन बैस राजपूत वंश में पैदा हुए थे। इसके प्रमाण समकालीन महाकवि बाणभट्ट के हर्षचरित और चीनी यात्री हुएन त्सांग के यात्रा विवरणों से प्राप्त होते है। बाणभट्ट ने अपनी कृति हर्षचरित में हर्षवर्धन को सूर्यवंशी क्षत्रिय लिखा है। कुछ विद्वान हर्षवर्धन के राजपूत होने पर संदेह करते हैं,किन्तु उनके तर्क निराधार हैं,प्रस्तुत हैं कुछ साक्ष्य जो हर्षवर्धन को सूर्यवंशी बैस क्षत्रिय राजपूत सिद्ध करने में पर्याप्त हैं-

1-हुएन त्सांग ने हर्षवर्धन को वैश लिखा है। हालांकि इस आधार पर कुछ इतिहासकारों ने हर्षवर्धन को वैश्य जाती का माना है।चीनी यात्री हुएन त्सांग ने वैशाली को भी वेश्याली लिखा है,इसी कारण कोई आश्चर्य नही कि उन्होंने इसी भाषा दोष के कारण वैस को वैश्य लिख दिया हो,जबकि वो खुद क्षत्रिय को राजा कि जाति बताता है। इसीलिए माना जाता है की हुएन त्सांग ने बैस को वैश लिख दिया है ,उसका अर्थ वैस क्षत्रिय है न कि वैश्य.
2- हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट ने साफ़-साफ़ हर्ष को क्षत्रिय लिखा है। हर्षवर्धन की बहन का विवाह एक प्रसिद्ध चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश मौखरी(मकवाना,झाला) में हुआ था। बाणभट्ट ने इस विवाह सम्बन्ध को सूर्यवंश और चंद्रवंश क्षत्रियों का मिलाप लिखा है जिससे ये सिद्ध होता है की वर्धन वंश सूर्यवंशी क्षत्रिय राजपूत वंश था क्योंकि सूर्यवंश और चन्द्रवंश क्षत्रिय राजपूतों में ही होते है और बैस राजपूत सूर्यवंशी ही है।
बाणभट कि हर्षचरित्र,उच्छ्वास 4,पृष्ठ संख्या 146 में श्लोक हैं,
"तत्त्वां प्राप्य चिरात्ख्लू राज(ज्य) श्रीयाघटितो तेजोमयो सकलजगदीयमान बुधकरणानन्दकारिगुणगणों सेम सूर्यावंशाशिव पुष्यभूति मुखरवंशो"
"अस्ति पुण्यकर्तामधिवासो वासवावास इव वसुधामवतीर्ण;****"
बाणभट की हर्षचरित्र में हर्षवर्धन के वंश को स्पष्ट सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है और कई जगह वसु,वास,वासवावास शब्द आये हैं जो हर्षवर्धन को स्पष्ट रूप से वैस/बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है।
इतिहासकार डॉ आर बी सिंह के अनुसार बाणभट्ट ने हर्षचरित में वैश्य वर्ण के बारे में बहुत सी निंदनीय बाते लिखी है जैसे "सूदखोर बनिया" तथा "जो लूटेरा ना हो ऐसा बणिक संसार में दुर्लभ है"। अगर हर्षवर्धन वैश्य वर्ण का होता तो उसका आश्रित कवि अपने राजा की जाती के बारे में ऐसी बाते नही बोलता।
इस प्रकार हर्ष के दरबारी राजकवि बाणभट कि हर्षचरित से भी सम्राट हर्षवर्धन का वंश बैस क्षत्रिय राजपूत वंश सिद्ध होता है.

3-हर्षवर्धन की पुत्री का विवाह वल्लभीपुर के सूर्यवंशी मैत्रक क्षत्रिय राजपूत राजा ध्रुवसेन से हुआ था।इन मैत्रक क्षत्रियों के वंशज वाला या वल्ला राजपूत आज भी सौराष्ट्र में मिलते हैं,कई विद्वान गुहिलौत वंश को भी वल्लभी के सुर्यवंश से उत्पन्न बताते हैं.विद्वानों के अनुसार छठी-सातवीं शताब्दी में विवाह संबंधो में वर्ण की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता था इसलिये इन वैवाहिक संबंधो से हर्षवर्धन का क्षत्रिय होना सिद्ध होता है।
4-नेपाल के इतिहास के अनुसार भी यह बैस क्षत्रिय राजवंश था। हर्ष ने नेपाल को जीतकर वहॉ अपना राज्य स्थापित किया था। कनिंघम के अनुसार नेपाल में जो बैस वंशीय राजपूत है वो सम्राट हर्ष के परिवार से है।हर्ष ने अपनी विजय के दौरान उन्हें वहॉ बसाया था।
इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी हर्षवर्धन को बैस राजपूत माना है,
feishe caste identified by sir alexander cunningham with the 
bais rajput (ano-beo-of india-432-33)
सातवी सदी में अंशुवर्मा नाम के क्षत्रिय ने नेपाल में जिस राजपूत वंश कि नीव रखी उसे वैश्यठाकुरी वंश(वैस राजपूत)वंश कहा जाता है,इनके लेखो में हर्ष संवत का इस्तेमाल होता था,जो यह सिद्ध करता है कि हर्षवर्धन और अंशुवर्मा एक ही क्षत्रिय वंश बैस राजपूत वंश से थे,इनके लेखो में इन्हें राजपुत्र लिखा है.वैशाली नेपाल के निकट है,अंशुवर्मा का शासन काल और हर्षवर्धन का शासनकाल समकालीन था.
(history of kannouj-by pandit R S Tripathi pp-94)
इतिहासकार स्मिथ भी कन्नौज पर बैस वंशी सम्राट हर्षवर्धन का शासन मानते हैं.वस्तुत: हर्षवर्धन का वंश वैस/बैस क्षत्रिय राजपूत वंश ही था.

5-शम्भुनाथ मिश्र (बैस वंशावली 1752)के पृष्ठ संख्या 2 पर सम्राट हर्षवर्धन से लेकर 25 वी पीढ़ी में राव अभयचंद तक और उसके बाद 1857 इसवी के गदर तक कुल 58 बैसवंशी राजपूतो के नाम दिए गए हैं.यह वंशावली बही के रूप में बैसवारे के बैस राजपूत परिवार रौतापुर में उपलब्ध है.यह क्रमबद्ध वंशावली हर्षवर्धन और आज के बैस राजपूतों का सीधा सम्बन्ध स्थापित करती है.
6-हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन कि जब मृत्यु हो जाती है तो उनकी माता सती होने के लिए तैयार हो जाती है और हर्ष से कहती है कि मै वीर की पुत्री,वीर की पत्नी और वीर की जननी हूँ,मेरे लिए सती होने के अतिरिक्त और क्या मार्ग है? इतिहासकार मुंशीराम शर्मा अपनी पुस्तक "वैदिक चिंतामणि" में लिखते हैं कि प्राचीन ग्रंथो में वीर शब्द का अर्थ ही क्षत्रिय होता है और सती प्रथा भी क्षत्रिय राजपूतों कि परम्परा रही है न कि वैश्य या शूद्रों की.
सती प्रथा कि परम्परा से भी हर्षवर्धन क्षत्रिय राजपूत प्रमाणित होता है.

7-चंडिका देवी बैस राजपूतों की कुलदेवी हैं और शिवजी उनके कुलदेवता. हर्षवर्धन बाद में बौद्ध हो गए थे,किन्तु वो चंडिका देवी और शिवजी की आराधना भी करते थे,यह सिद्ध करता है कि हर्षवर्धन बैस राजपूत ही थे.बाणभट से हर्षवर्धन ने चंडिका शतक और चंडिकाकष्टक लिखवाया,हर्ष बैसवाडे स्थित चंडिका के भव्य मन्दिर में नियमित रूप से दर्शनों के लिए आते थे, बैस वंश कि कुलदेवी और कुलदेव के प्रति श्रद्धा हर्षवर्धन को बैस राजपूत सिद्ध करती है. हर्षवर्धन और उनके पूर्वज सूर्य पूजा भी करते थे जो उनके वंश को सूर्यवंशी क्षत्रिय सिद्ध करता है.
8-आखिर में सबसे बड़ा तथ्य यह है की हर्षवर्धन ने अपने राज्याभिषेक समारोह में राजपुत्र की उपाधी ग्रहण की थी।हर्ष खुद को राजपुत्र शिलादित्य कहते थे,वस्तुत:हर्षवर्धन पहले क्षत्रिय राजा थे जिन्होंने राजपुत्र उपाधि को बहुत प्रयोग किया। उनके द्वारा नेपाल में स्थापित बैसठाकुरी वंश के राजा अंशुवर्मा ने भी उसी समय राजपुत्र उपाधि का प्रयोग किया,इसके बाद ही क्षत्रियों में राजपुत्र उपाधि का अधिक प्रयोग होने लगा,पहले यह संज्ञा सिर्फ राजपरिवार के सदस्य प्रयोग करते थे,बाद में सभी क्षत्रिय इसका प्रयोग करने लगे,और कुछ समय बाद क्षत्रियों के लिए राजपुत्र या राजपूत जातिनाम प्रयोग होने लगा। राजपुत्र उपाधि से हर्षवर्धन क्षत्रिय राजपूत प्रमाणित होते है।
इन सब तथ्यों से ये प्रमाणित होता है की हर्षवर्धन बैस राजपूत वंशी राजा थे। प्रसिद्द इतिहासकार कनिंघम, डॉ गौरीशंकर औझा, विश्वेरनाथ रेउ, देवी सिंह मंडावा, डॉ राजबली पांडे, डॉ जगदीश चन्द्र गहलोत, डॉ रामशंकर त्रिपाठी, भगवती प्रसाद पांथरी, पीटन पैटरसन, बुहलर, शैलेन्द्र प्रताप सिंह और प्रो लाल अमरेंद्र सिंह जैसे अनेको इतिहासकारो ने वर्धन वंश को बैस क्षत्रिय माना है। इस सबसे ये ही ज्ञात होता है की जिन इतिहासकारो ने उनके लिये वैश्य, ब्राह्मण या अन्य शब्द का इस्तमाल किया हैँ, वो या तो अज्ञानवष या किसी द्वेष भावना से ग्रस्त होकर किया है।

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**हर्षवर्धन के पूर्वज **


बैस राजपूत वंश उत्तर बिहार के शक्तिशाली वैशाली के लिच्छवी गणराज्य के क्षत्रियोँ से निकला है। जब मगध के नन्द राजवंश ने इस गणराज्य को नष्ट कर दिया तो वहॉ के क्षत्रिय देश के विभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गए। गणराज्य की राजधानी वैशाली नगर से निकास होने के कारण ये क्षत्रिय वैश/बैस के नाम से जाने गए। कालांतर में इनमे से एक शाखा ने श्रीकण्ठ नामक स्थान पर शासन स्थापित किया जिसका नाम बदलकर स्थानेश्वर हो गया।पहले इस स्थान पर श्रीकंठ नामक नागवंशी शासक का राज्य था। बाणभट्ट के अनुसार हर्षवर्धन के किसी पूर्वज का नाम पुष्यभूतिवर्धन था जिसने स्थानेश्वर(वर्तमान थानेश्वर) में राज्य स्थापित किया। इसलिये इस वंश को पुष्यभूती वंश भी कहा जाता है।पुष्यभूति के बाद नरवर्धन,उनके बाद राज्यवर्धन,उसके बाद आदित्यवर्धन,प्रभाकरवर्धन थानेश्वर की गद्दी पर बैठे। इस वंश के पाँचवे और शक्तिशाली शाशक प्रभाकरवर्धन हुए जिन्होंने सिंध, गुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया था और हूणों को भी पराजित किया था। इनकी उपाधी परम् भट्टारक राजाधिराज थी जिससे ज्ञात होता है की इन्होंने अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था। राजा प्रभाकरवर्धन के 2 पुत्र राज्यवर्धन और हर्षवर्धन और एक पुत्री राजश्री थी जिसका विवाह कन्नौज के मौखरी वंश के राजा ग्रहवर्मन से हुआ था जिससे उत्तर भारत के दो शक्तिशाली राजवंशो में मित्रता स्थापित हो गई थी और दोनों की शक्ति काफी बढ़ गई।
606ई. में परभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनका बड़ा पुत्र राज्यवर्धन गद्दी पर काबिज हुआ। इसी दौरान मौखरी वंश के शाशक ग्रहवर्मन की मालवा के शासक देव गुप्त से युद्ध में पराजय और मृत्यु हो गई। देव गुप्त ने ग्रहवर्मन की पत्नी और राज्यवर्धन की बहन राजश्री को बन्दी बना लिया। राज्यवर्धन से ये ना देखा गया और उसने देव गुप्त के विरुद्ध चढ़ाई कर के उसे पराजित कर दिया। उसी वक्त गौड़(बंगाल) का शाशक शशांक राज्यवर्धन का मित्र बनकर मगध पर चढ़ आया लेकिन उसकी देव गुप्त से गुप्त संधि थी। शशांक ने धोखे से राज्यवर्धन की हत्या कर दी। अपने बड़े भाई की हत्या का समाचार सुनने के बाद हर्षवर्धन ने इसका बदला लेने का प्रण लिया और देव गुप्त के साथ युद्ध कर के उसे मार दिया। हर्ष का 606ई. के लगभग 16 वर्ष की उम्र में ही राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने राजपुत्र की उपाधी धारण की।


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**हर्षवर्धन का राजकाल**

हर्ष ने राजगद्दी संभालने के बाद अपने को महान विजेता और योग्य प्रशाशक के रूप में स्थापित किया। हर्ष ने लगभग 41 वर्ष तक शाशन किया। इस दौरान उन्होंने स्थानेश्वर और कन्नौज के राज्य को एक किया और अपनी राजधानी कन्नौज में स्थापित की। उन्होंने शशांक को हराया और बंगाल, बिहार और उड़ीसा को अपने अधीन किया। हर्ष ने वल्लभी(आधुनिक गुजरात) के शासक ध्रुवभट को हरा दिया किन्तु उसकी वीरता को देखकर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया,हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तार कश्मीर, नेपाल, गुजरात, बंगाल, मालवा तक कर लिया था। उन्हें श्रीहर्ष शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता है और उन्होंने परम् भट्टारक मगध नरेश की उपाधी धारण कर ली थी। हालांकि हर्षवर्धन का दक्षिणी भारत को जीतने का सपना पूरा नही हो पाया। वातापी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय से उसे नर्मदा नदी के तट पर हार का सामना करना पड़ा जिसके बाद दोनों के बीच में संधि के तहत नर्मदा नदी को हर्षवर्धन के राज्य की दक्षिणी सीमा चिन्हित किया गया।

**धर्मपरायण और दानवीर सम्राट**


हर्षवर्धन ना केवल एक धर्मपरायण शाशक थे बल्कि वो सभी पंथो का सम्मान और प्रचार करते थे। शुरुआत में वो सूर्य उपासक थे, बाद में खुद शिव, विष्णु और कालिका की उपासना करते थे लेकिन साथ ही साथ बौद्ध धर्म की महायान शाखा के समर्थक भी थे। ऐसा माना जाता है की हर्ष प्रतिदिन 500 ब्राह्मणों और 1000 बौद्ध भिक्षुओँ को भोजन कराते थे। वो बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थे और उसके प्रचार के लिये उन्होंने बहुत दान दिया। उन्होंने अनेक स्तूप बनवाए और नालंदा विश्वविद्यालय को भी बहुत दान दिया। नालंदा विश्वविद्यालय की सुरक्षा के लिये उन्होंने उसके चारों ओर एक विशाल दिवार का निर्माण किया। कन्नौज में सैकड़ो बौद्ध विहार थे। डौंडियाखेड़ा, जो कुछ समय पहले तक भी बैस राजपूतो की रियासत रही है, वहा भी सैकड़ो विहार थे। कन्नौज में उन्होंने सन् 643 ई.में एक विशाल बौद्ध सभा का आयोजन किया जिसमे देश विदेश से अनेकों राजा और हजारों बौद्ध भिक्षु सम्मिलित हुए।
इन्होंने अपने समय में पशु हत्या और मांसाहार पर प्रतिबंध लगा दिया। गरीबो के लिये अनाथालय और पर्यटकों के लिये धर्मशालाए बनवाई। इनके समय में दो प्रमुख विश्विद्यालय थे जिसमे बड़ी संख्या में बाहर से विद्यार्थी आते थे, साथ ही अनेक पाठशालाओं का निर्माण इन्होंने करवाया।
हर्षवर्धन प्रत्येक कुम्भ में प्रयाग जाते थे और वहा अपना समस्त धन गरीबो को दान कर देते थे तथा अपनी बहन राज्यश्री से मांगकर कपड़े पहनते थे।

**धर्म, कला और साहित्य का संरक्षक**


हर्ष ना केवल कला और साहित्य के संरक्षक थे बल्कि खुद एक प्रतिष्ठित नाटककार एवं कवि भी थे। उन्होंने 'नागानन्द', 'रत्नावली' एवं 'प्रियदर्शिका' नामक नाटकों की रचना की। इनके दरबार में बाणभट्ट, हरिदत्त एवं जयसेन जैसे प्रसिद्ध कवि एवं लेखक शोभा बढ़ाते थे। बाणभट्ट ने हर्ष के काल के ऊपर हर्षचरित नामक ग्रन्थ लिखा जो की संस्कृत में लिखा पहला ऐतिहासिक काव्य ग्रन्थ है। इन्होंने हुएन त्सांग जैसे अनेक विद्वानों को भी प्रश्रय दिया।

***महान प्रशासक***


हर्षवर्धन एक महान प्रशाशक थे। वो अपने राज्य के प्रशाशन में व्यक्तिगत रूची लेते थे। उनका प्रशाशन बहुत सुव्यवस्थित था और जनता बहुत खुशहाल थी। इनके राज्य में कर बहुत कम होते थे और बड़े अपराध भी कम थे। अपराध करने वालोँ को कठोर सजा दी जाती थी। बड़े अपराध में नाक, कान, हाथ, पैर काट दिए जाते थे। इनके समय विदेशी नागरिक भी आने से डरते थे। एक बार हुएन त्सांग को भी सीमा पर रोक लिया गया था।
उनकी सेना भी उच्च कोटि की थी। हर्षवर्धन अपना अधिकतर समय युद्धभूमी पर सौनिक शिविरो में ही बिताते थे। वर्षा ऋतु को छोड़कर बाकी समय उनकी सेना विजय अभियान पर ही रहती थी। बाणभट्ट और हुएन त्सांग से उनकी भेंट सैन्य शिविरो में ही हुई थी।
हर्षवर्धन अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। अनेक राजाओं से उनके मैत्रीपूर्ण सम्बंध थे। उन्होंने चीन के शासकों से भी पहली बार कूटनीतिक सम्बंध स्थापित किये और कई दूत चीन भेजे। चीन शाशक की तरफ से भी कई दूत भारत आए।

अंत में हम इतना कह सकते है की हर्षवर्धन निस्संदेह भारतीय इतिहास के एक महान व्यक्तित्व है। वह एक कुशल शाशक, महान विजेता, दानशील और प्रजावत्सल, धर्मपरायण जैसे गुणों से युक्त व्यक्तित्व के धनी थे। साथ ही एक उच्च कोटि के कवि और नाटककार भी थे। गुप्त साम्राज्य के बाद के अव्यवस्था के दौर में इतना विशाल साम्राज्य स्थापित करने वाले पहले और संभवतया आखिरी शाशक थे। उन्होंने सभी धर्मो को समान आदर दिया और विद्या,कला, साहित्य का प्रसार किया। विद्वानों को भी वो बहुत आदर करते थे। इसलिये वो संस्कृति के महान संरक्षक और विद्या अनुरागी के रूप में भी जाने जाते हैँ। इसके साथ ही वो महान दानवीर भी थे। कूटनीति और सैन्य संचालन के क्षेत्र में भी उन्होंने महान कार्य किये। हर्ष ने अपनी माता और बहन को सती होने से बचाया और अपने भाई और बहन के पति की हत्या का बदला लिया। उन्होंने आपनी विधवा बहन राजश्री का जीवन भर संरक्षण किया। इनसे पता चलता है की एक शक्तिशाली शाशक होने के बावजूद पारिवार से लगाव जैसे मानवीय गुण भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थे।
हर्ष ने अपने राज्याभिषेक के समय ईस्वी सन 606 से हर्ष संवत प्रारम्भ किया.


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***हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद***

हर्षवर्धन की मृत्यु 647ई. में हुई। उनकी मृत्यु के बाद कमजोर शासकों की वजह से उनका राज्य कई छोटे-छोटे राज्यो में विभाजित हो गया।हर्ष कि मृत्यु के बाद किसी अर्जुन ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया,उसका हर्ष से या बैस वंश से क्या सम्बन्ध था ये ज्ञात नहीं है,अर्जुन ने चीनी दूत के साथ दुर्व्यवहार किया जिससे चीनी दूत अपने साथ नेपाल और तिब्बत कि सेना लेकर आया और अर्जुन हारकर कैद हो गया, हर्षवर्धन के विवरण में उनके मामा भंडी का जिक्र मिलता है,बाद में कन्नौज पर भंडी वंश के आयुध शासको का जिक्र मिलता है जिसे कुछ इतिहासकार राष्ट्रकूट वंश(राठौड़)का भी बताते हैं।
हर्षवर्धन के बाद उनके वंशज कन्नौज के आस पास ही कई शक्तियों के अधीन सामन्तों के रूप में शाशन करते रहे। हर्षवर्धन से 24 वीं पीढ़ी में बैस सामंत केशव राय ने मुहम्मद गोरी के विरुद्ध राजा जयचन्द की तरफ से चंदावर के युद्ध में भाग लिया। उनके पुत्र राव अभयचन्द ने उन्नाव,राय बरेली स्थित बैसवारा की स्थापना की। आज भी सबसे ज्यादा बैस राजपूत इसी बैसवारा क्षेत्र में निवास करते है। हर्षवर्धन से लेकर राव अभयचन्द तक 25 शासक/सामन्त हुए, जिनकी वंशावली इस प्रकार है-
1.हर्षवर्धन
2.यशकर्ण
3.रणशक्ति
4.धीरचंद
5.ब्रजकुमार
6.घोषचन्द
7.पूरनमल
8.जगनपति
9.परिमलदेव
10.मनिकचंद
11.कमलदेव 
12.यशधरदेव
13.डोरिलदेव
14.कृपालशाह
15.रतनशाह
16.हिंदुपति
17.राजशाह
18.परतापशाह
19.रुद्रशाह
20.विक्रमादित्य
21-ताम्बेराय 
22.क्षत्रपतिराव
23.जगतपति
24.केशवराव
25.अभयचंद
इन्ही हर्षवर्धन के वंशज राव अभयचंद बैस ने सन 1230 के लगभग बैसवारा राज्य कि नीव रखी.
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सन्दर्भ--------
1-हर्षचरित्र बाणभट्ट उच्छ्वास 4,पृष्ठ संख्या 146
2-ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के प्रष्ठ संख्या 112-114
3-देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74
4-महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या154-162
5-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के प्रष्ठ संख्या 78,79 एवं 368,369
6-डा देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स तोड़ कृत राजपूत जातियों का इतिहास प्रष्ठ संख्या 182
7-ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर
8-http://kshatriyawiki.com/wiki/Bais
9-https://www.google.co.in/url
10-http://www.indianrajputs.com/dynasty/Bais
11-http://wakeuprajput.com/orgion_bais.php
12-feishe caste identified by sir alexander cunningham with the
bais rajput (ano-beo-of india-432-33)
13-history of kannouj-by pandit jankisharan tripathi pp-94)
14-शम्भुनाथ मिश्र (बैस वंशावली 1752)के पृष्ठ संख्या 2
15-इतिहासकार मुंशीराम शर्मा की पुस्तक "वैदिक चिंतामणि"
16-विश्वेरनाथ रेउ, डॉ राजबली पांडे, डॉ जगदीश चन्द्र गहलोत, डॉ रामशंकर त्रिपाठी, भगवती प्रसाद पांथरी, पीटन पैटरसन, बुहलर, शैलेन्द्र प्रताप सिंह और प्रो लाल अमरेंद्र सिंह जैसे अनेको इतिहासकारो ने वर्धन वंश को बैस क्षत्रिय माना है।
17-http://books.google.co.in/…/about/The_Harshacharita.html%E2…
18- Cunningham, Alexander. The Ancient Geography of India: The Buddhist Period, Including the Campaigns of Alexander, and the Travels of Hwen-Thsang. 1871, Thübner and Co. Reprint by Elbiron Classics. 2003., p. 377.
19-http://www.encyclopedia.com/to…/Harsha_(Indian_emperor).aspx
20-http://www.kurukshetra.nic.in/…/Archeolog…/harsh_ka_tila.htm
21-http://www.encyclopedia.com/to…/Harsha_(Indian_emperor).aspx
22-http://www.britannica.com/EBchecked/topic/256065/Harsha
23-https://books.google.co.in/books
24-https://books.google.co.in/books
25-https://books.google.co.in/books
26-https://books.google.co.in/books
27-https://books.google.co.in/books
28-https://books.google.co.in/books
29-https://books.google.co.in/books
30-https://books.google.co.in/books
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4 comments:

  1. जानकारी पूर्ण लेख के लिए धन्यबाद । बहुत अच्छा काम हो रहा है ।हमारे इतिहास के जिस ज्ञान से हमे क्षद्म तरीके से दूर रखा गया था उसे ध्वस्त करते हुए यह जानकारी हमे सही पथ दिखाने की ओर बढ़ते कदम साबित होगे । ॐ

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  2. बहुत ही शानदार प्रयास,साधुवाद आपको

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  3. धन्यवाद सम्राट हर्षवर्धन को बीस राजपूत होने के पुख्ता प्रमाण उपलब्ध कराने के लिए

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  4. Thanks to all !! aj kal Kuch na samajh jat inhe apna batane lag rahe hai... jo bebuniyad hai... Bais kshtriye kul hai... rajput kul hai... uttar pradesh mei kannauj ke pass bainswara kshetra aaj b iski misal hai

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