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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, July 26, 2015

THAKUR KUSHAL SINGH JI RATHORE AUWA

THAKUR KUSHAL SINGH RATHORE AUWA AND HIS BRAVERY AGAINST BRITISH RULE

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास





ठाकुरो की बगावत लटका दिए ब्रिटिश गोरो के सिर अपने किलो के बहार लगवा दिए दिए थे मेले आजादी के
इतिहास की एक सच्ची घटना
जो लोग राजपूतो से जलकर हर दिन नए इल्जाम लगाते रहते है कि इतिहास को छोडकर राजपूतो ने अंग्रेजो के खिलाफ क्या किया ये पोस्ट उन्ही खोखले लोगो के लिए है जो आजकल हमारे पूर्वजो को अपना बनाकर हमे ही आंखे दिखा रहे है और एक बात ये कि ये तो सिर्फ एक महान योद्धा के बारे मे बताया है आज इनके अलावा भी हजारो राजपूत योद्धा है उनके बारे मे भी धीरे धीरे पोस्ट करेगें --!!
Thakur Kushal Singh ji Rathore From Auwa,Pali-Rajasthan
"लटका दिया था बड़े अँगरेज़ अफसर का सर अपने किले के बहार लगवा दिया था मेला जब हुयी थी अँगरेज़ गोरो की हार "
ठाकुरो की और ब्रिटिश जोधपुर संयुक्त सेना की जंग
"ठाकुर कुशाल सिंह आउवा" 1857 में राजस्थान क्रांति के पूर्व जहाँ राजस्थान में अनेक शासक ब्रिटिश भक्त थे, वहीं राजपूत सामन्तों का एक वर्ग ब्रिटिश सरकार का विरोध कर रहा था। अत: उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया । इस अवसर पर उन्हें जनता का समर्थन भी प्राप्त हुआ। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि राजस्थान की जनता में भी ब्रिटिश साम्राज्य के
विरुद्ध असंतोष की भावनाएं विद्यमान थी। जोधपुर में विद्रोह जोधपुर के शासक तख्तसिंह के विरुद्ध वहाँ के जागीरदारों में घोर असंतोष व्याप्त था। इन विरोधियों का नेतृत्व पाली मारवाड़ आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह कर रहे थे ।
1857 में आउवा ,पाली के ठाकुर कुशल सिंह जी राठौड़ ने जोधपुर राज्य से बगावत कर दी क्यों की जोधपुर के महाराजा तखत सिंह जी उस वक़्त ब्रिटिश गोवेर्मेंट और ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ दे रहे थे ठाकुर कुशल सिंह का गोडवाड़ के ज्यादातर ठाकुरो ने साथ दिया .....
1857 की क्रांति में में मारवाड़ /मेवाड़/गोडवाड़ के 30 से ज्यादा ठाकुरो ने जोधपुर स्टेट से बगावत कर ठाकुर कुशल सिंह जी का साथ दिया जिस में एरिनपुरा सुमेरपुर पाली की राजपूत आर्मी भी शामिल हो गयी अजमेर से पहले पाली अजमेर की सरहद पर भयानक लड़ाई हुयी और ब्रिटिश और जोधपुर राज्य की की सयुक्त सेना की अप्रत्यक्ष रूप से हार हुयी ठाकुर कुशल सिंह ने भंयकर युद्ध किया। २००० हजार सैनिको को मार डाला और तोपखाने की तोपे छीन ली। ब्रिगेडियर जनरल सर पैट्रिक लारेंस मैदान छोड़ कर भाग गया। इतनी बड़ी पराजय से फिरंगीयों को होश ऊड गये
,,,,तभी आउवा ठाकुर वह के कप्तान मोंक मेंसेंन का सिर काट कर आपने घोड़े पर बांधकर आपने किल्ले ले आये दूसरे ठाकुरो ने भी दूसरे ब्रिटिश गोरो का सिर काट अपने साथ ले आये ..........
इस लड़ाई के बाद अँगरेज़ राजपूताने में आपने पाँव नही जमा पाये और पुरे राजस्थान में अजमेर शहर को छोड़ कही अपनी ईमारत तक नही बना पाये …
और उस दिन सारे गाव में जश्न हुआ जो आज भी मेले के रूप में पाली जिले के "आउवा" गाव में मनाया जाता है एक साल बाद फिर आउवा पर अजमेर ,नसीराबाद ,मऊ व नीमच की छावनियो की फोजो आउवा पंहुची। सब ने मिलकर आऊवा पर हमला बोल दिया। क्रांति कारी सामन्तो के किलों को सुरंग से उड़ा दिया। आउवा को लूटा। सुगली देवी की मूर्ति अंग्रेज उठा ले गये।
हमला हुआ को किल्ले को काफी नुकशान पहुचाया गया
वही 1857 में गए ठाकुरो के ज्यादातर ठिकानो को जोधपुर दरबार ने खालसा कर दिया गया
** सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के साथ मिलकर जो व्यूह-रचना उन्होंने की उसमें यदि अँग्रेज़ फँस जाते तो राजस्थान से उनका सफाया होना निश्चित था। बड़े राजघरानों को छोड़कर सभी छोटे ठिकानों के सरदारों से क्रांति के दोनों धुरधरों की गुप्त मंत्रणा हुई। इन सभी ठिकानों के साथ घ् जोधपुर लीजन ' को जोड़कर कुशाल सिंह और केसरी सिंह ब्रितानियों के ख़िलाफ़ एक अजेय मोर्चेबन्दी करना चाहते थे।
** इसी के साथ आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह तथा आलयनियावास के ठाकुर अजीत सिंह भी अपनी सेना सहित आउवा आ गए। लाम्बिया, बन्तावास तथा रूदावास के जागीरदार भी अपने सैनिकों के साथ आउवा आ पहुँचे। सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के स्वातंत्र्य-सैनिक भी वहाँ आकर ब्रितानियों से दो-दो हाथ करने की तैयारी करने लगे। वही अपने क्षेत्र गोड़वाड के भी बहुत से ठाकुरो ने इनका साथ दिया
** जोधपुर सेना की अगुवाई अनाड़सिंह पंवार ने की थी जो बिथौड़ा के पास हुए इस युद्ध मरे गए तथा अँगरेज़ अफसर हीथकोट भाग खड़ा हुआ
** दुर्गति का समाचार मिलते ही जार्ज लारेंस ने ब्यावर में एक सेना खड़ी की तथा आउवा की ओर चल पड़ा। 18 सितम्बर को फ़िरंगियों की इस विशाल सेना ने आउवा पर हमला कर दिया। ब्रितानियों के आने की ख़बर लगते ही कुशाल सिंह क़िले से निकले और ब्रितानियों पर टूट पड़े। चेलावास के पास घमासान युद्ध हुआ तथा लारेन्स की करारी हार हुई।
** आस-पास से क्षेत्रों में आज तक लोकगीतों में इस युद्ध को याद किया जाता है। एक लोकगीत इस प्रकार है
ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बाँकियो।
एजेंट को मार कर, दरवाज़ा पर टाँकियो।
झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो, मुल्कां में ठाँवों दिया आहूवो।

1 comment:

  1. Adbud shorya or prakram ke dhani Thakur Kushal Singh Ji ko koti koti naman..

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