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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, August 16, 2015

हरियाणा के संस्थापक राणा हरराय चौहान (RANA HAR RAI CHAUHAN,THE FOUNDER OF HARIYANA)

                                                         राणा हरराय चौहान


मित्रों आज हम आपको चौहान वंश के ऐसे वीर यौद्धा की गाथा सुनाएंगे जिनके बारे आज बहुत कम लोग जानते हैं,
एक समय हरियाणा के इतिहास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है,यही नहीं दसवी सदी में इस हिस्से पर उनके शासन के बाद ही यह क्षेत्र हरयाणा के नाम से प्रसिद्ध हुआ,

आज हरियाणा,पंजाब,यमुना पार सहारनपुर,मुजफरनगर के लगभग सभी चौहान राजपूत राणा हर राय और उनके सगे सम्बन्धियों के वंशज हैं,यही नहीं गुर्जर,जाट,रोड,जातियों में जो चौहान वंश है उन सबके पूर्वज भी राणा हर राय चौहान को माना जाता है,जो राणा हर राय चौहान अथवा उनके पुत्रो के उस समय उन जातियों की महिलाओ से अंतरजातीय विवाह से उत्पन्न संतान के वंशज हैं जिनसे उन जातियों में चौहान वंश का प्रचलन हुआ,

========राणा हर राय चौहान का हरयाणा========


यह ऐतिहासिक कहानी है दसवी सदी की जब हरयाणा के उत्तर पूर्वी भाग पर चौहानो का राज्य स्थापित हुआ. नीमराना के चौहानो और पुण्डरी(करनाल,कैथल) के पुंडीर राजपूतों के बीच हुए इस रक्तरंजित युद्ध का इतिहास गवाह है। यह ऐतिहासिक कहानी आपको हरियाणा के उस स्वर्णिम काल में ले जाएगी जब यहां क्षत्रिय राजपूतो का राज था ,यानी अंग्रेजों और मुगलों के समय से भी पहले .
नीमराणा के राणा हर राय चौहान संतानहींन थे। राज पुरोहितो के सुझाव के पश्चात राणा हर राय गंगा स्नान के लिए हरिद्वार के लिए निकले। लौटते हुए उन्होंने एक रात करनाल के पास के क्षेत्र में खेमा लगाया।उस क्षेत्र का नाम बाद में जा कर जुंडला पड़ा क्यूंकि यहां जांडी के पेड़ उगते थे। राणा जी और उनकी सेना इस इलाके की उर्वरता व हरयाली देख कर मोहित हो गये। उनके पुरोहितों ने उन्हें यहीं राज्य स्थापित करने का सुझाव दिया क्यूंकि पुरोहितों को यह भूमि उनके वंश की वृद्धि के लिए शुभ लगी।

उस समय यह क्षेत्र पुंडीर क्षत्रियों के पुण्डरी राज्य के अंतर्गत था। विक्रमसम्वत 602 में यह राज्य राजा मधुकर देव पुंडीर जी ने बसाया था। राजा मधुकर देव जी का शासन तेलंगाना में था, वे अपने सैनिको के साथ तेलांगना से कुरुक्षेत्र ब्रह्मसरोवर में स्नान के लिए आये थे। तभ यहां के रघुवंशी राजा सिन्धु ( जो की हर्षवर्धन के पूर्वज हो सकते हैं) ने आपने बेटी अल्प्दे का विवाह उनसे किया और दहेज़ में कैथल करनाल का इलाका उन्हें दिया,
राजा मधुकर देव पुंडीर ने यही पर अपने पूर्वज के नाम पर पुण्डरी नाम से राजधानी स्थापित की,
बाद में उनके वंशजो ने यहां चार गढ़ स्थापित किये जो कि पुण्डरी, पुंडरक ,हावडी, चूर्णी(चूर्णगढ़) के नाम से जाने गए,

हर्षवर्धन के पश्चात् सन 712 इसवी के आसपास पुंडीर राजपूतो ने यमुना पार सहारनपुर और हरिद्वार क्षेत्र पर भी कब्जा कर 1440 गाँव पर अपना शासन स्थापित किया.
पुंडीर राज्य के दक्षिण पश्चिम में मंडाड राजपूतों का शासन था जोकि यहां मेवाड़ से आये थे और राजोर गढ़ के बड़गुजरों की शाखा थे। उनके एक राज़ा जिन्द्रा ने जींद शहर बसाया और इस क्षेत्र में राज किया। इन्होने चंदेल और परमार राजपूतों को इस इलाके से हराकर निकाल दिया और घग्गर नदी से यमुना नदी तक राज्य स्थापित किया। चंदेल उत्तर में शिवालिक पहाड़ियों की तराई में जा बसे।(यहां इन्होने नालागढ़ (पंजाब) और रामगढ़ ( पंचकुला ,हरयाणा) राज्य बसाये ).वराह परमार राजपूत सालवन क्षेत्र छोडकर घग्घर नदी के पार पटियाला जा बसे। जींद ब्राह्मणों को दान देने के बाद मंढाडो ने कैथल के पास कलायत में राजधानी बसाई व घरौंदा ,सफीदों ,राजौंद और असंध में ठिकाने बनाये।मंडाड राजपूतो का कई बार पुंडीर राज्य से संघर्ष हुआ पर उन्हें सफलता नहीं मिली.
गंगा स्नान से लौटते वक्त राणा हर राय चौहान थानेसर पहुंचे तथा पुरोहितो के सुझाव पर पुंडीरो से कुछ क्षेत्र राज करने के लिए भेंट में माँगा।पुंडीरो ने राणा जी की मांग ठुकराई और क्षत्रिये धर्म निभाते हुए विवाद का निर्णय युद्ध में करने के लिए राणा हर राय देव को आमंत्रित किया। जिसे हर राय देव ने स्वीकार किया।
ऐसा कहा जाता है कि मंडाड राजपूतो ने चौहानो का इस युद्ध में साथ दिया. पुंडीर सेना पर्याप्त शक्तिशाली होने के कारण प्रारम्भ में हर राय को सफलता नहीं मिली मात्र पुण्डरी पर वो कब्जा कर पाए,राणा हर राय ने हार नजदीक देख नीमराणा से मदद बुलवाई।

नीमराणा से राणा हर राय चौहान के परिवार के राय दालू तथा राय जागर अपनी सेना के साथ इस युद्ध में हिस्सा लेने पहुंचे.नीमराणा की अतिरिक्त सेना और मंडाड राज्य की सेना के साथ मिलने से राणा हर राय चौहान की स्थिति मजबूत हो गयी और चौहानो ने फिर हावडी,पुंड्रक को जीत लिया,अंत में पुंडीर राजपूतो ने चूर्णगढ़ किले में अंतिम संघर्ष किया और रक्त रंजित युद्ध के बाद इस किले पर भी राणा हर राय चौहान का कब्ज़ा हो गया,
इसके बाद बचे हुए पुंडीर राजपूत यमुना पार कर आज के सहारनपुर क्षेत्र में आये और कुछ समय पश्चात् उन्होंने दोबारा संगठित होकर मायापुरी(हरिद्वार)को राजधानी बनाकर राज्य किया,बाद में इस मायापुरी राज्य के चन्द्र पुंडीर और धीर सिंह पुंडीर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बड़े सामंत बने और सम्राट द्वारा उन्हें पंजाब का सूबेदार बनाया गया,यह मायापुर राज्य हरिद्वार,सहारनपुर,मुजफरनगर तक फैला हुआ था.
बाद में युद्ध की कटुता को भूलाते हुए चौहानों और पुंडीरो में पुन वैवाहिक सम्बन्ध होने लगे,

पुंडीर राज्य पर जीत के बाद राणा हर राय ने राय डालु को 48 गांव की जागीर भेंट की जो की आज क नीलोखेड़ी के आसपास का इलाका था।जागर को 12 गांव की जागीर यमुनानगर के जगाधरी शहर के पास मिली तथा हर राय के भतीजे को टोंथा के( कैथल ) आस पास के 24 गांव की जागीर मिली। राणा हर राय देव ने जुंडला से शासन किया।

इन्ही के नाम पर इस इलाके का नाम हरयाणा पड़ा जिसका मतलब वो स्थान जहा हर राय राणा के वंशज राज्य करते थे।(हर राय राणा =हररायराणा =हररायणा=हरयाणा).
परन्तु आजादी के बाद इसका अर्थ राजपूत विरोधी जातियों ने हरी का आना बना दिया जबकि हरी तो हमेशा से उत्तर प्रदेश में ही अवतरित हुए है, हरयाणा तो हरी की कर्म भूमि थी।

राणा हरराय चौहान और उनके चौहान सेना के वंशज आज हरयाणा के अम्बाला पंचकुला करनाल यमुनानगर जिलो के 164 गाँवो में बसते है।रायपुर रानी (84 गाँव की जागीर) इनका आखिरी बचा बड़ा ठिकाना है जो की आजादी के बाद तक भी रहा। हालाकिं इन चौहानो कई छोटी जागीरे चौबीसी के टिकाइओ के नीचे बचीं रहीं जैसे उनहेरी,टोंथा,शहजादपुर,जुंडला,घसीटपुर आदि जो बाद में अंग्रेजो के शासन के अंतर्गत आ गयी. इन चौहानो की एक चौबीसी यमुना पार मुज़्ज़फरनगर जिले में भी मिलती है। 
कलस्यान गुर्जर भी खुद को इसी चौहान वंश की शाखा मानते है,(मुजफरनगर गजेटियर पढ़े). राणा हर राय देव के एक वंशज राव कलस्यान ने गुर्जरी से विवाह किया जिनकी संतान ये कलसियान गुर्जर है।ये गुर्जर आज चौहान सरनेम लगाते है और इनके 84 गांव मुज़्ज़फरनगर के चौहान राजपूतो के 24 गाँव के साथ ही बसे हुए है।

राणा हर राय चौहान ने दूसरी जातियों जैसे जाट ,रोड़ , नाइ ,जोगन जातियों की लड़कियों से भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये।कुरुक्षेत्र के पास के अमीन गाँव चौहान रोड़ इन्ही के वंशज माने जाते है।लाकड़ा जाट या चौहान जाट भी इन्ही चौहानो के वंशज माने जाते है।नाइ व जोगन बीविओं की संताने आज सोनीपत और उत्तर प्रदेश के घाड के आसपास के इलाके में बसते है इन्हे खाकी चौहान कहा जाता है जिनमे शुद्ध रक्त के राजपूत विवाह नहीं करते। 

राणा हर राय के वंशज राणा शुभमल के समय अंबाला,करनाल क्षेत्र में चौहानो के 169 गाँव थे। शुभमल के पुत्र त्रिलोक चंद को 84 गाँव मिले जबकि दुसरे पुत्र मानक चंद को 85 गाँव मिले जो मुसलमान बन गया। त्रिलोक चंद की आठवी पीढ़ी में जगजीत हुए जो गुरु गोविनद सिंह के समय बहुत शक्तिशाली थे, 1756 में जगजीत के पोते फ़तेह चंद ने अपने दो पुत्रो भूप सिंह और चुहर सिंह के साथ अहमद शाह अब्दाली का मुकाबला किया जिसमे अब्दाली की विशाल शाही सेना ने कोताहा में धोखेे से घेरकर 7000 चौहानो का नरसंहार किया।
हरयाणा के चौहान आज भी बहुत स्वाभिमानी है और अपने इतिहास पर गर्व करते है। हरियाणा में राजपूतो की जनसँख्या और प्रभुत्व आज नगण्य सा हो गया है,
राणा हर राय देव चौहान की छतरी आज भी जुंडला गाँव (करनाल) में मौजूद है। पर ये दुःख की बात यहाँ के चौहान राजपूत अपने वीर पूर्वज की शौर्य गाथा को भूलते जा रहे है और हरयाणा में आज तक राणा हर राय देव के नाम पर कोई संग्रहालय मूर्ति या चौक नहीं स्थापित किये गए. हम आशा करते है इस पोस्ट को पढ़ने के बाद राणा हर राय देव चौहान को उनको वंशज यथा संभव सम्मान दिलवा पाएंगे।
जय राजपुताना,जय क्षात्र धर्म

========THE HARYANA OF HAR RAI==========

Around year 1000 AD, the north eastern part of Haryana came under the rule of Chauhans of Raathwar (Neemrana) after a blood shed with the Pundir’s of Pundri the ruler of the region at that time. This historical story would take you through the ages during the golden age of Kshatriya rule in Northern Haryana before Muslims, Sikhs and then British invaded this country.

Rana Har Rai Dev Chauhan of Neemrana visited the region for Ganga Snaan in the year around 944 A.D. Rana Har Rai was child less and wanted to offer prayers at Haridwar to fulfil his wish as directed by the Rajpurohits. He started his journey with a small chauhan army and rajpurohits from Neemrana. On his way, one night he camped in the area near Karnal which was later he named by him as Jundla on account of Jand trees growing round it. The Rana and his army were very amazed to see the lush green and fertile land in the area around. His Purohits adviced him to stay and establish rule here, as they considered this area to be very auspicious for him and his off springs to live and grow.

During that time , the area was under the stronghold of Pundri Rajya established in 555 A.D by Raja Madhukardev ji , who came also here from the region what is now called Telangana for Brahma Sarovar Snan at Thanesar. The Raghuvanshi Raja (Most probably the Ancestor of Harshvardhana) married his daughter to him and gave the area of 1440 villages to rule as dowry.

The Pundirs had established four forts in the region at Habri , Pundri , Pundrak and Churnigarh (near Chandigarh). To the south west of the Pundirs , there was the rule of Mandhars Rajputs. The Mandhar Rajputs came from Mewar here, they were a shakh of Birgurjars (not to be confused with gujjars pastoral caste, BC of Haryana) of Rajorgarh. One of their ruler Jindra eshtablished the city of Jindh. They expelled the Chandels and Barah (Parmar) Rajputs and took possession of the area (from Ghaggar in the north to Yamuna in the east), the Chandels went towards the Shivaliks ( Nalagarh of Punjab and Ramgharh of Panchkula Haryana) and the varah went beyond the river Ghaggar. After donating Jind to Brahmins. (which was later conquered by Bhatti Jatt sikh , who were turned into jatts from Rajputs by giving throne to the son born of Jatani, as Rajputani wives of the ruler did not had any offspring )the Mandhars fixed their capital at Kalayat near Kaithal and also established local centres of Asandh, Safidon, and Gharaunda.

The Rana Har Rai dev Chauhan , after his returning from the Ganga Snaan went to Thanesar and requested the pundirs to give him few villages to settle and establish rule. The Pundirs denied and invited Chauhan army for a war as per the Kshatriya tradition to rule. The invitation was accepted by Rana . The Rana’s army started their rage on the fort of Pundri. It is said that Mandhars also helped Chauhans in this battle. The fort of Pundri was conquered but due to a heavy damage to the Rana’s army, the local army offended more powerfully over Rana’s army at the other forts. The Rana called for help from Neemrana. Uncles of Rana Rao Dalu and Rao Jagar arrived with the army. The Chauhan army, then conquered the remaining fort of Habri, Pundak and Churni. The Pundirs were driven out their country and were thrown away beyond the river Yamuna in present day Uttar Pradesh. The Saga was so furious that not even a single village of Pundirs exists in Haryana now. As a symbol of treaty and sign of peace after battle Chauhans started taking daughters from Pundirs but didn’t use marry their daughters to them till very late dates. The Pundirs then established the rule at Mayapuri ( Haridwar) from the area extending from Haridwar to Muzzafarnagar districts in present day Uttar Pradesh.

After the victory ,Rana Har Rai gave 48 villages to Rana DAlU in the area around Nilokheri, Jagar 12 near Jagadhari , and Pinjora, the son of a 3rd uncle, 24 villages including Mohna and Tauntha in Kaithal. Rana Har Rai got settled in Jundla, and ruled the region and the area got his name as Haryana meaning the place where descendants of Har rai lived. (later the meaning was changed to Hari ka Ana by rival castes, but Hari always arrived in Uttar Pradesh, Kurukshetra was the Karma bhoomi). The descendants of Rana Har Rai and the Chauhan army now lives in 164 Chauhan villages in the area falling in districts of Ambala , Yamunanagar, Karnal , Kurukshetra and Kaithal. The Raipur Rani, a small princely (84 villages) near Naraingarh, Ambala was their last remaining state here. However , many Jagirs under Chaubisi heads like Unheri , Teontha , Shahjadpur , Jundala etc. still exists which later came under British rule. A branch of these Chauhans also crossed Yamuna and ruled in the area of near Muzzafarnagar, where still Chaubisi of this tribe exists. The Kalsyan Gurjar in Muzzafarnagar are descendants this branch of Chauhans. They claim descendants of Rao Kalsyan who married a Gurjari also(Refer Muzzafarnagar gazetteer) (but now these gurjars have started using Chauhan as sirname, claiming themselves to be the real chauhans). There villages are adjacent to the villages Chauhan Rajputs in Muzzafarnagar.

The Rana Har Rai also took ladies from inferior tribes like Ror , Jat , Nai , Jogan. The Chauhan Ror of Ameen near Kurukshetra are descendants from Ror wife. The Lakra Chauhan Jat are also descendants of these Chauhans (Refer British Gazetteer of Karnal). The descendants from Nai , Jogan wives now live near Sonipat and nearby areas of Uttar Pradesh are known as Khaki Chauhans with whom other pure blood Rajputs do not inter marry. The Chauhan Rajputs here are a proud race, whom the rule of the Sikhs and British have robbed of much of their ancestral power later. 

The Chattri of Rana Har Rai Dev still exists at Jundala near Karnal. It is sad to observe that as the time passed away, the descendants of Rana Har Rai has forgotten their Legendary ancestor. Not a single chowk, statue, Museum on his name exists in the area. The Rajputs of the area should come forward and try to pay the due tribute to him.
सन्दर्भ-----करनाल गजेटियर,मुजफरनगर गजेटियर 

1 comment:

  1. I am dharmendra Rajput.
    Bhagwan Shri krishna kis jati ke the

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