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Sunday, August 16, 2015

गैर राजपूत राजवंश और उनके राजपूत पूर्वज(SINSINWAR JAT OF BHARATPUR)



गैर राजपूत राजवंश और उनके राजपूत पूर्वज

(SINSINWAR JAT OF BHARATPUR)=====

कृपया इस महत्वपूर्ण पोस्ट को पूरा पढ़े और अधिक से अधिक शेयर करें........
मित्रों हमने आपसे वादा किया था कि इस ब्लॉग के माध्यम से हम आपको वास्तविक प्रमाणिक इतिहास से परिचित कराने का प्रयास करेंगे............
आज हम एक नयी श्रंखला शुरू करने जा रहे हैं जिसमे कुछ ऐसे राजवंशो का परिचय देंगे जो आज राजपूत समाज का हिस्सा नहीं है पर इनके पूर्वज राजपूत थे, जिनको रगों में भी क्षत्रिय रक्त है पर वर्ण संकर होने के कारण ये बंधू क्षत्रिय समाज में नहीं रह पाए.किन्तु इन्होने क्षत्रिय राजपूत समाज से अलग होकर भी राजवंशो की स्थापना की.
राजपूतों के लिए रक्त की शुद्धता शुरुआत से अहम रही है और यही हमें हमारे क्षत्रिय धर्म एवं संस्कार सिखाते हैं ! क्षत्रियता के कड़े मापदंडो पर जो नहीं उतर पाता उस क्षत्रिय को जाति विहीन रह कर या दूसरी निम्न जातियों में मिलकर बसर करना पड़ता है ! इसी सन्दर्भ में इस पोस्ट में आज तथा इसके अगले भागों में कुछ वंश बताये जायेंगे जिनका मूल निकास क्षत्रिय राजपूत वंशो से ही हुआ है पर आज ये दूसरी जातियों में पाए जाते है।
------------------भाग १-------------------
सबसे पहले शुरुआत भरतपुर राजवंश के सिनसिनवार गोत्र के जाट घराने से करते हैं !
======भरतपुर राजवंश=======
भरतपुर राजवंश सिनसिनवार जाट गोत्र का होना माना जाता है।सिनसिनवार जाट अपनी उत्पत्ति जादौन राजपूतो( असली यादव )से मानते है। इस राजवंश के मूल पुरुष ठाकुर सीन्द्पाल थे जिनकी वंशावली करौली के यदुवंशी जादौन राजघराने से शुरू होती है। भरतपुर राजपरिवार अपनी वंशावली ठाकुर थान पाल से शुरू मानता है जो की सिनसिनी गांव के ठाकुर सीन्द्पाल के 12 पीढ़ी बाद हुए। ठाकुर थान पल के कई पुत्र हुए जिनमे से ठाकुर धरम पाल सबसे बड़े और ठाकुर मदन पल तीसरे नंबर के पुत्र थे। ठाकुर मदन पाल के वंश में ठाकुर बाल चन्द्र पैदा हुए। ठाकुर बाल चन्द्र की राजपूत पत्नियों से कोई संतान नहीं हुई परन्तु उनकी एक जाट पत्नी से उन्हें दो संताने हुई जिनका नाम बिरद (बिज्जी) और सुरद (सिज्जी) था।परन्तु कुछ जाट इतिहासकार और जाटों का नया इतिहास नमक किताब के अनुसार बालचंद्र जादौन ने एक दिन किसी सोरोत जाट लड़की का डोला लूट लिया और उससे शादी की।यह बात आज की तरह बालचंद जादौन के परिवार और ठाकुर समाज को स्वीकार नही थी,इनसे जो संतान पैदा हुई उसको राजपूत समाज ने नहीं अपनाया.

क्षत्रियो ने सदा ही रक्त और वर्ण की शुद्धता पर विश्वास किया है और यही उनका क्षत्रिय धरम भी सिखाता है। परिणामवष यह परिवार राजपूत बिरादरी से अलग हो गया और जाटों में ही रिश्ते करने शुरू कर दिए तथा जाट बिरादरी में शामिल हो गया ठाकुर बिराद चंद ठाकुर खानु चंद के पूर्वज थे। ठाकुर खानु चंद से भरतपुर राजपरिवार का उदय होना माना जाता है।ठाकुर खानु चंद जाट जाति के नेता बने और मुग़लों के अस्त होते काल 17 वी शताब्दी में ये काफी शक्तिशाली हुए।
बाद में इस वंश के राजाराम और चूडामण काफी शक्तिशाली हो गए,
(इनके बाद किस प्रकार बदन सिंह ने जयपुर के राजा सवाई जयसिंह की मदद से शक्ति अर्जित की .इस वंश के सबसे ताकतवर राजा सूरजमल और राजपूतो के कैसे सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध रहे,किस प्रकार उसके पुत्र जवाहर सिंह ने घमंड में चूर होकर राजपूतो को नीचा दिखाने की कोशिश की,जिसका परिणाम उसे मावन्डा मढोली की करारी हार के रूप में देखना पड़ा और जयपुर के राजपूतो द्वारा जवाहर सिंह को दी गई इस करारी मात ने उत्तर भारत में बड़ी शक्ति के उदय का स्वप्न चकनाचूर कर दिया,इसी समय फ़्रांसिसी यात्री फादर वेन्डेल भरतपुर आया था ,उसने जाटों के बारे में और जयपुर से उनकी हार के बारे में क्या क्या लिखा है उन सब विषयों पर हम शीघ्र ही अलग से एक विस्तृत पोस्ट करेंगे.)
(note-भरतपुर राजवंश में राजाराम,चूडामन,बदन सिंह,सूरजमल से लेकर जवाहर सिंह तक उनके राजपूतो से सम्बन्ध और मावन्डा मढोली के एतिहासिक युद्ध पर शीघ्र ही अलग से पोस्ट की जाएगी)
अतः आज के सिनसिनवार जाट जादौन राजपूतों के वंशज और भाई माने जाते है।एक और चौकाने वाली बात यह भी है के इस वंश के कई लोग आज भी नाम के पहले ठाकुर टाइटल लगाते है और भरतपुर राजवंश कुंवर भंवर जैसे राजपूत उपाधियों का प्रयोग करता है।
अनेक कपोलकल्पित एतिहासिक मान्यताओं के लिए मशहूर जाट वेबसाइट जाटलैंड भी भरतपुर राजपरिवार की करौली जादौन से उत्पत्ति मानते है परन्तु वह इसे उलटे प्रकार से यह कह कर प्रस्तुत करते है के सिन्सीवर जाटों का राज करौली पर था और भरतपुर राजवंश की उत्पत्ति राजा सूरज मल से मानते है.जबकि ये विख्यात है की करौली के जादौन वंश जो की असल यदुवंश है मथुरा से यहाँ राजा ब्रह्म पाल यादव (जादौन) के समय आये और सं ९०० ईस्वी में करौली राज्य स्तापित किआ।
इस श्रंखला की अगली कड़ी में पंजाब हरियाणा की भाटी राजपूतो से निकलकर बनी फूल्कियाँ जाट रियासतों(पटियाला,नाभा,जीन्द,कैथल,फरीदकोटआदि )और उनके राजपूत पुरखों पर प्रकाश डाला जाएगा..
From the Pages of Pre Independent India: Some Non Rajput States and their Rajput Ancestry Part 1

======BHARATPUR STATE=======


The Rulers of Bharatpur are of Sinsiwar Jat clan .They claim descent of Jadon Rajputs, from Sind Pal, common ancestor with the House of Karauli. The ancestry of this family starts from Thakur Than Pal, twelfth in descent from Thakur Sind Pal of Sinsini village, had several sons, including Dharam Pal, the eldest son and Madan Pal the third son. The Madan Pal is considered the predecessor of Bharatpur royal family. His descendant, Bal Chand or Balchandra of Sinsini, having no issue by his wife, took a Jat lady, by whom he had two sons named Birad (Bijji) and Surad (Sijji). But according to some Jat scholars and the book called “Jaton ka Naya Itihas”, Balu Chand Jadaun looted the palanquin of a sarot Jat lady near Karauli and married her. The brothers of Balchandra , did not accepted this heinous crime committed by him. They deprived him from the status of Rajputra. The family was then degraded from Rajput ancestry and they continued their relations in the Jat community. Thakur Birad was the ancestor of Thakur Khanu Chand from whom the prominent history of Bharatpur starts.
The descendants of Khanu Chand became leaders of the Jat race and rose to considerable power during the Mughal decline in the late seventeenth century. Badan Singh extended his territories and received enhanced titles and honours. The power of the Bharatpur reached its zenith under Suraj Mal, Badan Singh's nephew, stepson, adopted son and successor. Thereafter the Jadon jats of Bharatpur proved fickle allies, making and breaking alliances with the Mughals, Mahrattas and the British. Losing territory to all three, but also gaining Deeg in the process. The British, under Lord Lake, fruitlessly besieged the fort of Bharatpur twice in 1804 and 1805, eventually settling for a treaty of protection after the failure of the second siege. The fort eventually fell to Lord Combermere's forces in 1826, after the British intervened to unseat a usurper, and demolished. Thereafter, Jats proved to be great allies, supplying large numbers of recruits for the Indian Army and the Maharajas participating in Imperial campaigns. The state acceded to the Dominion of India in August 1947, and merged into the Matsya Union in 1948 (absorbed into Rajasthan in 1949).
Therefore, it can be stated that Sinsiwar clan of jats are brethren of Jadaun khatriya clan. Interestingly, Jadaun jats or Sinsiwar still uses their ancestral titles of Thakur , Kunwar , Bhanwar at some places in the region. The famous Jat site jatland accepts the fact the Bharatpur rulers are descendants from Yaduvansha but it is completely tried to hide the fact that this ruling family were originally Yaduvanshi Jadaun Rajput clan. The site in turn states that Sinsiwar jats were the rulers of Karauli state and the founder of Bharatpur state was Raja Surajmal. But it is historically accepted that the rulers of Karauli state were Predecessor state of Mathura and it was founded about 900AD by Raja Brahm Pal Yadav (Jadaun). Please refer to the sources below before commenting.
Sources:
• Chiefs and Leading Families in Rajputana, Office of the Superintendent of Government Printing,Calcutta,1894,1903and1916.
• Major H.E. Drake-Brockman. A Gazetteer of Eastern Rajputana, comprising the native states of Bharatpur, Dholpur, & Karauli.
• Scottish Mission Industries Co. Ltd., Ajmer, 1905.
Kunj Bihari Lal Gupta. The Evolution of the Administration of the former Bharatpur State. Vidya Bhawan Publishers, Jaipur, 1959.
• Tony McClenaghan. Indian Princely Medals: A record of the Orders, Decorations and Medals of the Indian Princely States. Lancer Publications, Spantech & Lancer, New Delhi, 1996.
• Jwala Sahai. His Highness Maharaja Jaswant Singh Bahadur, GCSI of Bharatpur. Jwala Sahai, Bharatpur, 1914.
• Jaton ka Naya Itihas , a book
and www.royalark.net
**फादर वेन्डेल के संस्मरण
note- यह आर्टिकल राजपुताना सोच एवं क्षत्रिय इतिहास की बौद्धिक संपत्ति है,सभी बंधुओं से अनुरोध है कि कृपया इसे शेयर करें,और कहीं राजपूत समाज के हित में कॉपी भी करे तो साथ हमारे पेज का सोर्स और लिंक जरुर लिखे.

11 comments:

  1. Replies
    1. आदरनीय श्रीमान यही सत्य है

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    2. आदरनीय श्रीमान यही सत्य है

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  2. i am from sinsinbar royal family and i belongs to royal family nd i know about our origin. this post is very false.

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  3. जदौन वंश यदुवंश की एक गौरव पूर्ण शाखा है.और करौली यादवों के लिए मथुरा के समान ही पवित्र है।माता कैला देवी माता यगेश्वरी(जो कि यादवों कि कूलदेवी है)कि अवतार है।

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  4. Jadaun or Jadon is rajput caste...and this is true fact

    I am Jadaun Rajput

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