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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Monday, September 14, 2015

1857 की क्रांति के महानायक कुंवर सिंह की महागाथा (VEER KUNVAR SINGH,THE GREATEST FREEDOM FIGHTER)

===अंग्रेज़ो विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम में राजपूतो का योगदान- भाग-3 ===


मित्रो जैसा कि सभी को पता है कि 1857 के संग्राम में राजपूत अंग्रेज़ो के विरुद्ध संघर्ष में सबसे आगे रहे थे। हमेशा की तरह राजपूतो ने इस संग्राम का नेतृत्व किया था। 1857 का संग्राम, सबसे पहले मुख्यत: एक सैनिक विद्रोह था जिसमे अधिकतर अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के राजपूत सैनिक शामिल थे। इन सैनिको से प्रेरणा लेकर ही इन क्षेत्रो में आम जनता ने अंग्रेज़ो के विरुद्ध बगावत करी। अवध में तो ये बगावत सबसे भीषण थी और समाज के लगभग हर वर्ग ने संग्राम में भाग लिया जिसका नेतृत्व राजपूतो ने किया। अवध, पूर्वांचल और पश्चिम बिहार के राजपूतो ने संग्राम में सबसे सक्रीय रूप से भाग लिया जिसके परिणाम स्वरुप संघर्ष समाप्ति के बाद अंग्रेज़ो ने उनका दमन किया। सिर्फ अवध में ही एक साल के अंदर राजपूतो की 1783 किलों/गढ़ियों को ध्वस्त किया गया जिनमे से 693 तोप, लगभग 2 लाख बंदूके, लगभग 7 लाख तलवारे, 50 हजार भाले और लगभग साढ़े 6 लाख अन्य तरह के हथियारों को अंग्रेज़ो ने जब्त करके नष्ट किया। यहाँ तक की अधिकतर संपन्न राजपूतो के घर किलेनुमा होते थे, उन्हें भी नष्ट कर दिया गया। इसके बाद शस्त्र रखने के लिये अंग्रेज़ो ने लाइसेंस अनिवार्य कर दिया जो बहुत कम लोगो को दिया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ की अवध के राजपूत शस्त्रविहीन हो गए।इसके अलावा वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुन्देलखण्ड, मध्य प्रदेश, हरयाणा, राजस्थान में भी राजपूत ही स्वाधीनता के इस संघर्ष में सबसे आगे थे जिसका खामियाजा उन्हें अपनी जमीनें और रियासते गवाँ कर उठाना पड़ा।
अंग्रेज़ो के विरुद्ध संघर्ष में राजपूतो के योगदान से परिचित कराते हुए इससे पहले हम लखनेसर के सेंगर और वीर राम सिंह पठानिया पर पोस्ट कर चुके है। इस श्रृंखला में यह तीसरी पोस्ट 1857 के सबसे बड़े योद्धा बिहार के वीर राजपूत कुँवर सिंह जी और उनके भाई अमर सिंह जी पर है।

~~भारत माँ का सच्चा सपूत 1857 का महान राजपूत योद्धा वीर कुंवर सिंह 1777 -1858~~

जीवन परिचय और गौरव गाथा-----

बाबू कुंवर सिंह का जन्म आरा के निकट जगदीशपुर रियासत में 1777 में हुआ था | मुग़ल सम्राट शाहजहा के काल से उस रियासत के मालिक को राजा की उपाधि मिली हुई थी।ये उज्जैनिया पवार(परमार)राजपूत कुल के थे. कुंवर सिंह के पिता का नाम साहेबजादा सिंह और माँ का नाम पंचरतन कुवरी था | कुंवर सिंह की यह रियासत भी डलहौजी की हडप नीति का शिकार बन गयी थी।

कुंवर सिंह न केवल 1857 के महासमर के सबसे महान योद्धा थे, बल्कि वह इस संग्राम के एक वयोवृद्ध योद्धा भी थे। इस महासमर में तलवार उठाने वाले इस योद्धा की उम्र उस समय 80 वर्ष की थी। महासमर का यह वीर न केवल युद्ध के मैदान का चपल निर्भीक और जाबांज खिलाड़ी था, अपितु युद्ध की व्यूहरचना में भी उस समय के दक्ष , प्रशिक्षित एवं बेहतर हथियारों से सुसज्जित ब्रिटिश सेना के अधिकारियों, कमांडरो से कही ज्यादा श्रेष्ठ थे।

क्रांति की घटनाएँ------

10 मई 1857 से इस महासमर की शुरुआत के थोड़े दिन बाद ही दिल्ली पर अंग्रेजो ने पुन: अपना अधिकार जमा लिया था। अंग्रेजो द्वारा दिल्ली पर पुन:अधिकार कर लेने के बाद भी 1857 के महासमर की ज्वाला अवध और बिहार क्षेत्र में फैलती धधकती रही। दानापुर की क्रांतिकारी सेना के जगदीशपुर पहुंचते ही 80 वर्षीय स्वतंत्रता प्रेमी योद्धा कुंवर सिंह ने शस्त्र उठाकर इस सेना का स्वागत किया और उसका नेतृत्त्व संभाल लिया।
इस समय तक क्रांतिकारियों की अधिकांश गथिविधियाँ असफल सिद्ध हो रही थी क्योंकि उनमे उचित रणनीति का आभाव था,
महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के शब्दों में -----------

"अंग्रेजो का जुआ उतार फेकने के बाद जिस एक कमी के कारण क्रांतिकारियों के सारे परिश्रम विफल हो रहे थे,वह कुशलता और रणनीति की कमी जगदीशपुर के राजमहल ने शेष न रहने दी,इसलिए जगदीशपुर के उस हिन्दू राजा के ध्वज की और सोन नदी उतरकर ये सिपाही दोड़े जा रहे थे.क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम का नेत्रत्व करने वाला सुयोग्य नेता इन्हें जगदीशपुर में ही मिलने वाला था.राजपूत वंश की खान से ही जिस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म हुआ उस वीर का नाम कुंवर सिंह था.अपने स्वदेश को गुलामी की कठिन अवस्था में देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि के कारण वह वृद्ध कुंवर सिंह अपने महल में मूंछो पर ताव देता खड़ा था.
वृद्ध युवा--हाँ वह वृद्ध युवा था,क्योंकि अस्सी शरद ऋतुएँ देह पर से उतर गई थी.परन्तु उनकी आत्मा का तेज अभी भी जीवित अंगारे सा दहकता था.अस्सी वर्ष का कुंवर सिंह,अस्सी वर्ष का कुमार और उसमे भी सिंह,,,उसके देश का अंग्रेजो द्वारा किया गया अपहरण उसे कैसे मान्य हो?????अपने स्वदेश का अपहरण करने वाली अंग्रेजी तलवार के मै टुकड़े करूँगा,ऐसी गर्जना कुंवर सिंह ने कीं और उन्होंने गुपचुप शिवाजी की निति पर चलते हुए नाना साहब से सम्पर्क करके क्रांति की योजना बनाई,

कुंवर सिंह के मन में क्रांति की भावनाएं जोर पकड़ रही हैं ये जानकारी जल्द ही अंग्रेजो को मिल गई और उन्होंने छल से कुंवर सिंह को पकड़ने की निति बनाई...
भयंकर चाल,भयंकर बोल और हर हर महादेव का बोल...अफजल खान वध के पोवाडा की चाल.....
पटना के कमिश्नर टेलर ने कुंवर सिंह को आतिथ्य का विनम्र निमन्त्रण भेजा,पर चतुर कुंवर सिंह ने अस्वस्थता का बहाना बनाकर इसे ठुकरा दिया,
जल्द ही दानापुर के बागी सिपाही जगदीशपुर आ पहुंचे,अब फिर किसके लिए ठहरना????
पटना शहर हाथी पर बैठकर जाने से भी अस्वस्थता के कारण जिस कुंवर सिंह ने मना कर दिया था वो राजा भोज परमार का वंशज और अस्सी साल का बुजुर्ग राजपूत अपनी रुग्ण शैय्या से तडाक से उठा और सीधा रणभूमि में ही जाकर रुका"

क्रांति की घटनाएँ-----

कुंवर सिंह के नेतृत्त्व में इस सेना ने सबसे पहले आरा पर धावा बोल दिया। क्रांतिकारी सेना ने आरा के अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया। जेलखाने के कैदियों को रिहा कर दिया गया। अंग्रेजी दफ्तरों को ढाहकर आरा के छोटे से किले को घेर लिया। किले के अन्दर सिक्ख और अंग्रेज सिपाही थे। तीन दिन किले की घेरेबंदी के साथ दानापुर से किले की रक्षा के लिए आ रहे कैप्टन डनवर और उनके 400 सिपाहियों से भी लोहा लिया। डनवर युद्ध में मारा गया। थोड़े बचे सिपाही दानापुर वापस भाग गये। किला और आरा नगर पर कुंवर सिंह कीं क्रांतिकारी सेना का कब्जा हो गया। लेकिन यह कब्जा लम्बे दिनों तक नही रह सका। मेजर आयर एक बड़ी सेना लेकर आरा पर चढ़ आया। युद्ध में कुंवर सिंह और उसकी छोटी सी सेना पराजित हो गयी। आरा के किले पर अंग्रेजो का पुन: अधिकार हो गया।

कुंवर सिंह अपने सैनिको सहित जगदीशपुर की तरफ लौटे। मेजर आयर ने उनका पीछा किया और उसने जगदीशपुर में युद्ध के बाद वहा के किले पर भी अधिकार कर लिया। कुंवर सिंह को अपने 122 सैनिको और बच्चो स्त्रियों के साथ जगदीशपुर छोड़ना पडा। अंग्रेजी सेना से कुंवर सिंह की अगली भिडंत आजमगढ़ के अतरौलिया क्षेत्र में हुई। अंग्रेजी कमांडर मिल मैन ने 22 मार्च 1858 को कुंवर सिंह की फ़ौज पर हमला बोल दिया। हमला होते ही कुंवर सिंह की सेना पीछे हटने लगी अंग्रेजी सेना कुंवर सिंह को खदेड़कर एक बगीचे में टिक गयी। फिर जिस समय मिल मैन की सेना भोजन करने में जुटी थी, उसी समय कुंवर सिंह की सेना अचानक उन
पर टूट पड़ी। मैदान थोड़ी ही देर में कुंवर सिंह के हाथ आ गया। मिलमैन अपने बचे खुचे सैनिको को लेकर आजमगढ़ की ओर निकल भागा। अतरौलिया में पराजय का समाचार पाते ही कर्नल डेम्स गाजीपुर से सेना लेकर मिलमैन की सहायता के लिए चल निकला। 28 मार्च 1858 को आजमगढ़ से कुछ दूर कर्नल डेम्स और कुंवर सिंह में युद्ध हुआ। कुंवर सिंह पुन: विजयी रहे। कर्नल डेम्स ने भागकर आजमगढ़ के किले में जान बचाई।

अब कुंवर सिंह बनारस की तरफ बड़े। तब तक लखनऊ क्षेत्र के तमाम विद्रोही सैनिक भी कुंवर सिंह के साथ हो लिए थे। बनारस से ठीक उत्तर में 6 अप्रैल के दिन लार्ड मार्क्कर की सेना ने कुंवर सिंह का रास्ता रोका और उन पर हमला कर दिया। युद्ध में लार्ड मार्क्कर पराजित होकर आजमगढ़ की ओर भागा। कुंवर सिंह ने उसका पीछा किया और किले में पनाह के लिए मार्क्कर की घेरे बंदी कर दी। इसकी सुचना मिलते ही पश्चिम से कमांडर लेगर्ड की बड़ी सेना आजमगढ़ के किले की तरफ बड़ी। कुंवर सिंह ने आजमगढ़ छोडकर गाजीपुर जाने और फिर अपने पैतृक रियासत जगदीशपुर पहुचने का निर्णय किया। साथ ही लेगर्ड की सेना को रोकने और उलझाए रखने के लिए उन्होंने अपनी एक टुकड़ी तानु नदी के पुल पर उसका मुकाबला करने के लिए भेज दी। लेगर्ड की सेना ने मोर्चे पर बड़ी लड़ाई के बाद कुंवर सिंह का पीछा किया। कुंवर सिंह हाथ नही आये लेकिन लेगर्ड की सेना के गाफिल पड़ते ही कुंवर सिंह न जाने किधर से अचानक आ धमके और लेगर्ड पर हमला बोल दिया। लेगर्ड की सेना पराजित हो गयी।

अब गंगा नदी पार करने के लिए कुंवर सिंह आगे बड़े लेकिन उससे पहले नघई गाँव के निकट कुंवर सिंह को डगलस की सेना का सामना करना पडा। डगलस की सेना से लड़ते हुए कुंवर सिंह आगे बढ़ते रहे। अन्त में कुंवर सिंह की सेना गंगा के पार पहुचने में सफल रही। अंतिम किश्ती में कुंवर सिंह नदी पार कर रहे थे, उसी समय किनारे से अंग्रेजी सेना के सिपाही की गोली उनके दाहिनी बांह में लगी। कुंवर सिंह ने बेजान पड़े हाथ को अपनी तलवार से काटकर अलग कर गंगा में प्रवाहित कर दिया। घाव पर कपड़ा लपेटकर कुंवर सिंह ने गंगा जी पार की।
वीर सावरकर ने किस प्रकार अपनी पुस्तक 1857 के स्वतंत्रता समर के पृष्ठ संख्या 340-341 में इस घटना का वर्णन किया है आप स्वयं पढ़ें------
"भारत भूमि का यह सौभाग्य तिलक,स्वतंत्रता की तलवार-राणा कुंवर सिंह !गंगा पाट में बीचो बीच पहुँच गया तब शत्रु की एक गोली आई और राणा के हाथ में घुस गई.खून की धारा बह निकली.जिससे सारे शरीर में गोली का जहर फैलने का खतरा हो गया.....
यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया???
आंसू बहाने लगा क्या???
तनिक भी विचलित हुआ क्या?रक्त का बहाव रोकने को किसी से सहायता मांगी क्या??
नही-नही ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.हाथ पर मक्खी बैठे,उतना भी कम्पित नही हुआ.उसने दुसरे हाथ से अपनी तलवार निकाली,और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ अपना हाथ कुहनी से छांट दिया और वह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की--हे माता हे गंगा ! बालक का यह उपहार स्वीकार कर!!
इस महान वृद्ध राजपूत द्वारा भगीरथी को यह अलौकिक उपहार अर्पित करते ही उसकी शीतल फुआरो ने उसका देह सिंचन किया और मात्रप्रेम से उत्साहित यह वीरवर अपनी सेना सहित गंगा पार हो गया"
अंग्रेजी सेना उनका पीछा न कर सकी। गंगा पार कर कुंवर सिंह की सेना ने 22 अप्रैल को जगदीशपुर और उसके किले पर पुन: अधिकार जमा लिया। 23 अप्रैल को ली ग्रांड की सेना आरा से जगदीशपुर की तरफ बड़ी ली ग्रांड की सेना तोपों व अन्य साजो सामानों से सुसज्जित और ताजा दम थी। जबकि कुंवर सिंह की सेना अस्त्र -शस्त्रों की भारी कमी के साथ लगातार की लड़ाई से थकी मादी थी। अभी कुंवर सिंह की सेना को लड़ते - भिड़ते रहकर जगदीशपुर पहुचे 24 घंटे भी नही हुआ था। इसके बावजूद आमने-सामने के युद्ध में ली ग्रांड की सेना पराजित हो गयी।
चार्ल्स बाल की 'इन्डियन म्युटनि' में उस युद्ध में शामिल एक अंग्रेज अफसर का युद्ध का यह बयान दिया हुआ है की-------
"वास्तव में जो कुछ हुआ उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है। लड़ाई का मैदान छोडकर हमने जंगल में भागना शुरू किया। शत्रु हमे पीछे से बराबर पीटता रहा। स्वंय ली ग्रांड को छाती में गोली लगी और वह मारा गया। 199 गोरो में से केवल 80 सैनिक ही युद्ध के भयंकर संहार से ज़िंदा बच सके। हमारे साथ के सिक्ख सैनिक हमसे आगे ही भाग गये थे"
22 अप्रैल की इस जीत के बाद जगदीशपुर में कुंवर सिंह का शासन पुन: स्थापित हो गया। किन्तु कुंवर सिंह के कटे हाथ का घाव का जहर तेजी से बढ़ रहा था इसके परिणाम स्वरूप 26 अप्रैल 1858 को इस महान वयोवृद्ध पराक्रमी विजेता का जीवन दीप बुझ गया।
राजा कुंवर सिंह के दो पुत्र हुए वे भी इस संग्राम में शहीद हुए
1. दल भंजन सिंह जो 5 नवंबर 1857 को कानपूर के युद्ध में शहीद हुए
2. वीर भंजन सिंह जो 8 अक्टूबर 1857 को बाँदा के युद्ध में शहीद हुए
आप परमार वंश की उज्जैनिया शाखा हुए थे बिहार में उज्जैन से आये हुए परमारों को उज्जैनिया कहा जाता है
अंग्रेज इतिहासकार होम्स लिखता है की-- उस बूढ़े राजपूत की जो ब्रिटिश सत्ता के साथ इतनी बहादुरी व आन के साथ लड़ा 26 अप्रैल 1858 को एक विजेता के रूप में मृत्यु हुई। एक अन्य इतिहासकार लिखता है की कुवरसिंह का व्यक्तिगत चरित्र भी अत्यंत पवित्र था, उसका जीवन परहेजगार था। प्रजा में उसका बेहद आदर- सम्मान था। युद्ध कौशल में वह अपने समय में अद्दितीय थे। 

इसका सबसे बड़ा सबूत यह है की इस महान योद्धा ने न केवल कई जाने माने अंग्रेज कमांडरो को युद्ध के मैदान में पराजित किया अपितु जीवन के अंतिम समय में विजित रहकर अपने गाँव की माटी में ही प्राण त्याग किया | उनकी मृत्यु 26 अप्रैल 1858 को हुई, जबकि उसके तीन दिन पहले 23 अप्रैल को जगदीशपुर के निकट उन्होंने कैप्टन ली ग्राड की सेना को युद्ध के मैदान में भारी शिकस्त दी थी। 
वीर सावरकर के शब्दों में-------
"""'जब कुंवर सिंह का जन्म हुआ था तब उनकी भूमि स्वतंत्र थी और जिस दिन कुंवर सिंह ने प्राण त्यागे उस दिन भी उनके किले पर स्वदेश और स्वधर्म का भगवा ध्वज लहरा रहा था,,राजपूतो के लिए इससे पुण्यतर मृत्यु और कौन सी हो सकती है??????
उसने अपने अपमान का प्रतिशोध लिया और अल्प साधनों से शक्तिशाली अंग्रेज सेना के दांत खट्टे कर दिए...श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है,सन 1857 के क्रांतियुद्ध में कोई नेता सर्वश्रेष्ठ था तो वीर कुंवर सिंह था,युधकला में कोई उनकी बराबरी कर सके ऐसा कोई था ही नहीं,क्रांति में शिवाजी के कूट युद्ध की सही सही नकल कैसे की जाए उसी अकेले ने सिद्ध किया.तांत्या टोपे और कुंवर सिंह के युद्ध चातुर्य की तुलना करें तो कुंवर सिंह की कूट पद्धति ही अधिक बेजोड़ थी"""

कुंवर सिंह द्वारा चलाया गया स्वतंत्रता युद्ध खत्म नही हुआ। अब उनके छोटे भाई अमर सिंह ने युद्ध की कमान संभाल ली।

~~~अमरसिंह~~~

कुंवर सिंह के बाद उनके छोटे भाई अमर सिंह जगदीशपुर की गद्दी पर बैठा। अमर सिंह ने बड़े भाई के मरने के बाद चार दिन भी विश्राम नही किया। केवल जगदीशपुर की रियासत पर अपना अधिकार बनाये रखने से भी वह सन्तुष्ट न रहे। उन्होंने तुरंत अपनी सेना को फिर से एकत्रित कर आरा पर चढाई की। ली ग्रांड की सेना की पराजय के बाद जनरल डगलस और जरनल लेगर्ड की सेनाये भी गंगा पार कर आरा की सहायता के लिए पहुच चुकी थी। 3 मई को राजा अमर सिंह की सेना के साथ डगलस का पहला संग्राम हुआ। उसके बाद बिहिया, हातमपुर , द्लिलपुर इत्यादि अनेको स्थानों पर दोनों सेनाओं में अनेक संग्राम हुए। अमर सिंह ठीक उसी तरह युद्ध नीति द्वारा अंग्रेजी सेना को बार - बार हराते और हानि पहुचाता रहे, जिस तरह की युद्ध नीति में कुंवर सिंह निपुण थे। निराश होकर 15 जून को जरनल लेगर्ड ने इस्तीफा दे दिया। लड़ाई का भार अब जनरल डगलस पर पडा।
डगलस के साथ सात हजार सेना थी। डगलस ने अमर सिंह को परास्त करने की कसम खाई। किन्तु जून , जुलाई, अगस्त और सितम्बर के महीने बीत गये अमर सिंह परास्त न हो सके। इस बीच विजयी अमर सिंह ने आरा में प्रवेश किया और जगदीशपुर की रियासत पर अपना आधिपत्य जमाए रखा। जरनल डगलस ने कई बार हार खाकर यह ऐलान कर दिया जो मनुष्य किसी तरह अमर सिंह को लाकर पेश करेगा उसे बहुत बड़ा इनाम दिया जाएगा, किन्तु इससे भी काम न चल सका। तब डगलस ने सात तरफ से विशाल सेनाओं को एक साथ आगे बढाकर जगदीशपुर पर हमला किया। 17 अक्तूबर को इन सेनाओं ने जगदीशपुर को चारो तरफ से घेर लिया। अमर सिंह ने देख लिया की इस विशाल सैन्य दल पर विजय प्राप्त कर सकना असम्भव है। वह तुरंत अपने थोड़े से सिपाहियों सहित मार्ग चीरते हुए अंग्रेजी सेना के बीच से निकल गए। जगदीशपुर पर फिर कम्पनी का कब्जा हो गया, किन्तु अमर सिंह हाथ न आ सके। कम्पनी की सेना ने अमर सिंह का पीछा किया। 19 अक्तूबर को नौनदी नामक गाँव में इस सेना ने अमर सिंह को घेर लिया। अमर सिंह के साथ केवल 400 सिपाही थे। इन 400 में से 300 ने नौनदी के संग्राम में लड़कर प्राण दे दिए। बाकी सौ ने कम्पनी की सेना को एक बार पीछे हटा दिया। इतने में और अधिक सेना अंग्रेजो की मदद के लिए पहुच गयी। अमर सिंह के सौ आदमियों ने अपनी जान हथेली पर रखकर युद्ध किया। अन्त में अमर सिंह और उसके दो और साथी मैदान से निकल गये। 97 वीर वही पर मरे। 
नौनदी के संग्राम में कम्पनी के तरफ से मरने वालो और घायलों की तादाद इससे कही अधिक थी। 

कम्पनी की सेना ने फिर अमर सिंह का पीछा किया। एक बार कुछ सवार अमर सिंह के हाथी तक पहुच गये। हाथी पकड लिया, किन्तु अमर सिंह कूद कर निकल गए। अमर सिंह ने अब कैमूर के पहाडो में प्रवेश किया। शत्रु ने वहा पर भी पीछा किया किन्तु अमर सिंह ने हार स्वीकार न की।
इसके बाद राजा अमर सिंह का कोई पता नही चलता। जगदीशपुर की महल की स्त्रियों ने भी शत्रु के हाथ में पड़ना गवारा न किया। लिखा है की जिस समय महल की 150 स्त्रियों ने देख लिया की अब शत्रु के हाथो में पड़ने के सिवाय कोई चारा नही तो वे तोपों के मुँह के सामने खड़ी हो गयी और स्वंय अपने हाथ से पलीता लगाकर उन सबने ऐहिक जीवन का अन्त कर दिया।
बाबू कुँवर सिंह और अमर सिंह की शौर्य गाथा आज भी याद की जाती है और उनपर भोजपुरी में अनेक लोकगीत और लोकोक्तिया प्रचलित है-
बाबू कुंवरसिह तेगवा बहादुर
बंगला पर उडता अबीर
होरे लाला बांग्ला पर उडता अबीर।
बाबू कुंवर सिंह तोहरे राजबिनु,
हम ना रंगाइबो केसरिया।
कप्तान लिखे मिलअ कुंवर सिंह,
आरा के सबा बनाइब रे
बाबू कुंवर सिंह भेजते सनेसवा, मोसे
न चली चतुराई रे
जब तक प्रान रहीतन भीतर, मारग नहीं बदलाई रे
जे न हिदी कुंवर सिंह के साथ,
उ अगीला जन्म में होई सुअर।
ओकर बाद होई भुअर
राम अनुज जगजान लखन,
ज्यो उनके सदा सहाई थे।
गोकुल मे बलदाऊ के प्रिय थे,
जैंसे कुँवर कन्हाई थे।
वीर श्रेष्ठ आल्हा के प्यारे,
ऊदल ज्यो सुखदाई थे।
अमर सिंह भी कुंवर सिंह के
वैंसे ही प्रिय भाई थे।
कुवरसिंह का छोटा भाई
वैंसा ही मस्ताना था,
सब कहते हैं अमर सिंहभी
बडा वीर मर्दाना था।
संदर्भ सूची--
1---वीर सावरकर कृत 1857 का स्वतंत्रता समर पृष्ठ संख्या 259-271 एवं पृष्ठ संख्या 333-347
2-http://freegita.in/1857-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A…/2

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