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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Thursday, October 22, 2015

पूर्व उपराष्ट्रपति स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत(The legendary Bhairo singh Shekhawat ji)

आज क्षत्रिय समाज के पुरोधा देश के पूर्व उपराष्ट्रपति स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत जी की जयंती है।
स्वर्गीय भैरो सिंह जी की गणना स्वतंत्र भारत के सर्वाधिक योग्य और महान राजनेताओं में की जाती है।वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक थे।
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जीवन परिचय----

भैरोंसिंह शेखावत जी का जन्म 23 अक्टूबर 1923 ईस्वी को तत्कालिक जयपुर रियासत के गाँव खाचरियावास में हुआ था। यह गाँव अब राजस्थान के सीकर जिले में है। इनके पिता का नाम श्री देवी सिंह शेखावत और माता का नाम श्रीमती बन्ने कँवर था। गाँव की पाठशाला में अक्षर-ज्ञान प्राप्त किया। हाई-स्कूल की शिक्षा गाँव से तीस किलोमीटर दूर जोबनेर से प्राप्त की, जहाँ पढ़ने के लिए पैदल जाना पड़ता था। हाई स्कूल करने के पश्चात जयपुर के महाराजा कॉलेज में दाखिला लिया ही था कि पिता का देहांत हो गया और परिवार के आठ प्राणियों का भरण-पोषण का भार किशोर कंधों पर आ पड़ा, फलस्वरूप हल हाथ में उठाना पड़ा।
बाद में पुलिस की नौकरी भी की; पर उसमें मन नहीं रमा और त्यागपत्र देकर वापस खेती करने लगे।

इनकी पत्नी का नाम सूरज कंवर और एकमात्र संतान पुत्री रतन कँवर है।इनके दामाद श्री नरपत सिंह राजवी हैं जो राजस्थान में मंत्री रह चुके है ।

राजस्थान में वर्ष 1952 में विधानसभा की स्थापना हुई तो शेखावत ने भी भाग्य आजमाया और विधायक बन गए। फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा तथा सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते हुए विपक्ष के नेता, मुख्यमंत्री और उपराष्ट्रपति पद तक पहुँच गए।

भैरो सिंह शेखावत का राजनितिक कैरियर एक नजर में
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1-आरएसएस में स्वयंसेवक रहे। थानेदार की नौकरी छोड़ने के बाद 1948 में जनसंघ की सदस्यता ली। शेखावत ने 1952 में विधानसभा की चुनाव लड़ा।

2-जनसंघ के प्रदेश अध्यक्ष रहे।

3-जनसंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे।

4-भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे।

5-भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य रहे।

6-जिन सीटों पर वे विधायक रहें

1952 दांतारामगढ़ से 
1957 श्रीमाधोपुर से 
1962 किशनपोल से
1967 किशनपोल से 
1977 छबड़ा से 
1980 छबड़ा से 
1985 आमेर से 
1990 धौलपुर से 
1993 बाली से 
1998 बाली से

7-राज्य सभा सदस्य : 1974 से 1977

8-मुख्यमंत्री

पहली बार : 22 जून, 1977 से 15 फरवरी, 1980 
दूसरी बार : 4 मार्च, 1990 से 15 दिसबर, 1992
तीसरी बार : 4 दिसंबर, 1993 से 31 दिसंबर, 1998

9-विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष

पहली बार : 15 जुलाई, 1980 से 10 मार्च,1985 
दूसरी बार : 28 मार्च,1985 से 30 दिसंबर, 1989 
तीसरी बार : 8 जनवरी, 1999 से 18 अगस्त, 2002

10-उपराष्ट्रपति : (देश के 11 वे उपराष्ट्रपति)

19 अगस्त, 2002 से 21 जुलाई, 2007
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सभी पक्षो में स्वीकार्यता---
बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में रहे भैरोसिंह जी की स्वीकार्यता सभी दलो में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर थी।उपराष्ट्रपति के चुनाव में उनके विरुद्ध दलित नेता सुशील कुमार शिंदे को इस उद्देश्य से खड़ा किया गया था कि वो एनडीए ख़ेमे के दलित मतों में सेंधमारी करेंगे।मगर जब परिणाम आया तो मालूम पड़ा कि उल्टा स्व: भैरोसिंह जी के पक्ष में विपक्षी दलो में भारी  क्रॉस वोटिंग हुई थी।

लेकिन यह भी तथ्य है कि स्वर्गीय भैरोसिंह जी के मुख्यमंत्रिकाल में ही राजस्थान में राजपूत विधायको की संख्या घटकर 16 तक आ गयी थी और जाट विधायको की संख्या बढ़कर 50 तक पहुंच गयी थी।उन्होंने जाटों को बीजेपी से जोड़ने का भरसक प्रयत्न किया पर सफलता नही मिली।यहाँ तक कि राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में अपने भतीजे प्रतापसिंह खाचरियावास के विरुद्ध उन्होंने जाट छात्र नेता पूनिया को समर्थन दिया था।
राजपूत समाज से अलग हटकर भैरोसिंह जी ने जमीदारी उन्मूलन का समर्थन किया और रूपकँवर सती मामले में भी राजपूतो की नाराजगी के बावजूद सती प्रथा की निंदा भी की।

हाल ही में बीजेपी की कोई पत्रिका प्रकाशित हुई है उसमे भी स्वर्गीय भैरोसिंह जी के बीजेपी में योगदान का उल्लेख तक नही है।
ये विडम्बना ही है कि जिस पार्टी को बनाने और मजबूत करने के लिए भैरोसिंह जी ने कई बार अपने समाज,परिवारजनो तक की नाराजगी मोल ली और अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया उस पार्टी ने उनकी उपलब्धियों और योगदान का उल्लेख करना भी गवारा नही किया।।

अंतिम दिन-------
जब भैरो सिंह जी राजस्थान छोड़कर देश के उपराष्ट्रपति बनने जा रहे थे तो उन्होंने ही वसुंधरा राजे को राजस्थान बीजेपी की कमान सौंपने का निर्णय लिया था।
यह वही वसुंधरा राजे हैं, जिन्होंने राजस्थान के सिंह कहलाने वाले भैरोंसिंह शेखावत को अपने प्रदेश में ही बेगाना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

स्वर्गीय शेखावत राजस्थान में विपक्ष के नेता की अपनी गद्दी वसुंधरा राजे को सौंपकर दिल्ली गए थे। लेकिन वसुंधरा राजे ने राज शिष्टाचार की वह व्यावहारिक परंपरा भी नहीं निभाई, जिसमें देश के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को पूरे कार्यकाल में अधिकारिक रूप से हर प्रदेश में कमसे कम एक बार तो आमंत्रित किया ही जाता है। 

श्रीमती राजे यह नहीं चाहतीं थीं कि उपराष्ट्रपति के पद से रिटायर होने के बाद शेखावत फिर से राजस्थान में अपनी राजनीतिक पकड़ गहरी करें। जो लोग थोड़ी बहुत राजनीति समझते हैं, उनको यह भी अच्छी तरह से पता है कि वसुंधरा राजे अपने कार्यकाल में इतनी आक्रामक हो गई थीं कि बीजेपी के बहुत सारे लोग शेखावत की परछाई से भी परहेज करने लगे थे। वजह यही थी कहीं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे नाराज न हो जाएं।
आज भी शेखावत जी के निधन के बाद वसुंधरा उनके दमाद नरपत सिंह राजवी की घोर विरोधी है और उन्हें मन्त्रीमण्डल में शामिल नही कर रही है।
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निधन----
वे कांग्रेस के धुर-विरोधी वरिष्ठ नेताओं में प्रमुख थे लेकिन उन्हें सभी राजनीतिक दलों में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।उनकी स्वीकार्यता सभी दलों में बराबर थी।तभी उपराष्ट्रपति चुनाव में उनको सभी दलों का वोट मिला था।
उनकी स्वीकार्यता सर्वसमाज में थी।
दिनांक 15 मई 2010 को जयपुर में 86 वर्ष की आयु में आपका देहांत हो गया।

स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत जी को शत शत नमन।
Thakur Bhairo Singh Shekhawat Ji

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