Friday, July 10, 2015

भारत का सबसे ज्यादा शहीदों वाला जांबाज राजपूतों का गाँव मौधा

LAND OF MARTYRS : VILLAGE MOUDHA UTTAR PRADESH

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास 

देशभक्ति का जज्बा देखना हो तो मौधा गाँव आइये...
अब तक देश के लिये हो चुके हैँ 44 शहीद....
ये है भारत माता के सच्चे सपूत असली राजपूत....

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में मोहम्मदाबाद के पास स्थित है मौधा नामक गाँव। आजादी की लड़ाई के दिनों से भारत माता की आन बान शान के लिये मौधा गाँव के रहने वाले सैनिको के शहीद होने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता के बाद आज तक भी उसी भावना से कायम है। देश की सीमा पर बेटे के शहीद होने की खबर आती है तो मौधा में मातम नही छाता बल्कि माँ अपने दुसरे बेटे को भी उसी रास्ते पर चलने के लिये भेज देती है।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1987 के श्री लंका गृह युद्ध तक विभिन्न रेजिमेंट में लड़ते हुए मौधा गाँव के 44 सैनिको ने मातृ भूमि की रक्षा के लिये अपनी शहादत दी है। इस छोटे से गाँव में 200 से उपर पूर्व सैनिक अभी भी रह रहे हैँ और करीब 350 जवान आज भी राजपूत सहित कई रेजिमेंटो में देश की सीमाओ की रक्षा के लिये तैनात हैँ। गाँव में 5 जुलाई का दिन गौरवशाली था जब देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यहाँ बने शहीद स्मारक का लोकार्पण किया जिस पर लगी पट्टिका पर शहादत देने वाले 44 सैनिको का नाम अंकित है।
मौधा गाँव पूरा क्षत्रियो का है जिसमे मुख्यत राठौड़ क्षत्रिय निवास करते हैँ। इस गाँव के राजपूत ठाकुर शक्ति सिंह के वंशज है। यह गाँव फर्रुखाबाद में राठौड़ो का सबसे प्राचीन गाँव है। कन्नौज के बाद खोर और खोर के बाद मौधा को ही राठौड़ो ने अपनी राजधानी बनाया और इसके बाद खिमसेपुर रियासत की स्थापना, इसी गाँव के राठौड़ो ने की थी। इन्होंने एक समय कन्नौज पर भी राज किया था और बाद में फर्रुखाबाद क्षेत्र में लगातार मुग़ल और तुर्को से संघर्ष करते हुए राठोड़ो की खिमसेपुर रियासत के नेतृत्व में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी।
इस गाँव और क्षेत्र के क्षत्रियो द्वारा देश, धर्म के लिये लड़ने की यह राजपूती परंपरा प्रथम तुर्क आक्रमण से बदस्तूर चली आ रही है जब चंदावर के युद्ध में गौरी के विरुद्ध क्षेत्र के राजपूत लड़ाके बहादुरी से लड़े थे। इसके बाद भी मुगल काल से लेकर फर्रुखाबाद के बंगश नवाबो तक से क्षेत्र के लड़ाके लगातार जूझते रहे। मुगल काल में जनपद के क्षत्रियो के लगातार बगावती और स्वतंत्र आचरण से मजबूर होकर ही उनको दबाने के लिये बंगश पठानों को बसाया गया था। इन बंगश नवाबो के बहुत अत्याचारो का मुकाबला यहाँ के क्षत्रियो ने किया।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इन क्षत्रियो ने बंगश अफगान नवाब की कई गुना ताकतवर सेना को कई दिन तक चले भीषण युद्ध में धूल चटाई थी। भारत भूमि के लिये कुर्बान होने की यह राजपूती परंपरा बाद में भारतीय फ़ौज में शामिल होकर निभाई जाती रही है।
सिर्फ 800 की वयस्क पुरुष आबादी वाले इस गांव के हर घर के बेटे फ़ौज में रहकर देश की सीमाओं की रखवाली में लगे हैँ। हर घर में पूर्व फौजी हैँ और उनकी अगली पीढ़ी भी फ़ौज में है। पूर्व फौजियों में एक ब्रिगेडियर रामसेवक सिंह राठौड़ और 7 कर्नल के पद से रिटायर हुए हैँ।
प्रथम विश्व युद्ध में लड़ते हुए इसी गाँव के 10 सैनिक शहीद हुए थे। उसके बाद से द्वितीय विश्व युद्ध, चीन युद्ध, 1965, 1971 और श्रीलंका के गृह युद्ध तक कुल 44 लोग शहीद हो चुके हैँ। इस गाँव के अलावा आस पास के हैदरपुर, गोसरपुर, मुड़गांव, करनपुर, अरसानी, ईसेपुर, गढ़ी बनकटी, सहसपुर, मॉडल शंकरपुर, जिन्जौटा पहाड़पुर, संकिसा, सिरौली, न्यामतपुर ठाकुराना, धीरपुर, बनकिय, जमुनापुर, सनौड़ा, इश्वरी और मरान गाँव के अनेको क्षत्रिय देश के लिये लड़े और शहीद हुए हैँ। 1971 की लड़ाई में अकेले मौधा गाँव से सौ से ऊपर लड़ाको ने देश के लिये के लिये मोर्चा लिया था। कारगिल युद्ध तक यहाँ के राजपूत लड़ाके दुश्मनों के दांत खट्टे करते आ रहे हैँ। ज्यादातर लोगो ने 2-3 युद्धों में लगातार हिस्सा लिया। एक युद्ध में घायल होने के बाद दुसरे युद्ध में दोबारा लड़ने के लिये चले गए। एक ही परिवार के कई भाई एक साथ युद्ध के मोर्चे पर होते थे।
आज भी गाँव के पूर्व सैनिको की स्मृतियों में युद्ध भूमि की यादे तरो ताजा हैँ और बहादुरी के किस्सों की खान हैँ जिन्हें वो गर्व से सुनाते हैँ। इनमे बहुत से लोग युध्दों में घायल हुए, किसी के हाथ नही, किसी के पैर नही, तो किसी के पास हाथ, पैर, आँखे कुछ भी नही बची, ये सब गाँव में आज भी हैँ। इन सभी को आज पेंशन मिलती है। लेकिन आज भी उनमे बलिदान देने का जज्बा है, कहते हैँ कि आज भी मातृभूमि के लिये लड़ने का मौका मिले तो दुश्मन के दांत खट्टे करने में पीछे नही रहेंगे। बहुत से शहीदों की विधवाओ का भी निधन हो चुका है। कहते हैँ कि उस समय शहीदों का शव वापिस नही आता था, सिर्फ कपड़े आते थे। बहुत से लोगो के तो कपड़े भी नही आ पाए थे, सिर्फ टेलीग्राम आया था। अधिकारी, नेता आदि एक बार पूछकर फिर दोबारा हाल चाल नही लेते। उस समय शहीदों के परिवारो को बहुत सुविधाए भी नहीँ मिलती थीं, वेतन मात्र 200 रुपए होता था, लेकिन गाँव के नौजवान सेना में जाने के लिये सदैव आतुर रहे।
मेजर जगदीश सिंह की पहल पर बना स्मारक----
शहीदों का गाँव होने के बाद भी गाँव में शहीद स्मारक नही था जिससे शहीदों की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के साथ ही आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिले। शहीद स्मारक बनवाने में मेजर जगदीश सिंह राठौड़ सबसे पहले आगे आए और मुहीम की शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने पूर्व सैनिकों, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों से संपर्क किया। सभी ने पूरा मदद करने का आश्वासन दिया। वर्ष 2013 में नींव रखी। वर्ष 2015 में शहीद स्मारक बनकर तैयार हो गया। शहीद स्मारक के निर्माण में करीब 20 लाख रुपये की लागत आई है। इसके निर्माण कार्य में कैप्टन लालबहादुर सिंह, इंद्रपाल सिंह, हवलदार संभर सिंह, मेजर जगदीश सिंह समेत आधा सैकड़ा पूर्व सैनिकों, प्रधानों, पूर्व सांसद ठाकुर चंद्रभूषण सिंह मुन्नूबाबू और राजपूताना ग्रुप के चेयरमैन वीरेंद्र सिंह राठौर ने सहयोग किया।
इस शहीद स्मारक का अनावरण 5 जुलाई को देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह जी ने किया। शहीदों की विधवाओ को सम्मानित करते हुए गृह मंत्री भावुक हो गए और उनका गला रुंध गया। 
इस अवसर पर गृहमंत्री ने कहा कि "वीर सपूतों की धरती मौधा पर उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश को नाज है। मौधा के शहीदों ने भारत माता के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने को बलिदान कर दिया। मैं यहां के भाई बहनों को अपना शीश झुकाकर नमन करता हूं। प्रथम विश्व युद्ध हो या द्वितीय। हिटलर के नाजीवाद के खिलाफ लड़ाई हो या फिर 1971 और कारगिल का युद्ध यहां के सैनिकों ने भारत मां के सम्मान पर चोट नहीं पहुंचने दी। मौधा के सपूतों ने हर लड़ाई में बलिदान दिया। देश में जहां भी जाऊंगा और विश्व में भी मैं मौधा गांव का नाम लोगों को याद कराने की कोशिश करूंगा। देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले यह सैनिक मरने वाले नहीं हैं। वह तो अमर हैं। प्रति वर्ष शहीद स्मारक पर एकत्र होकर कार्यक्रम होने चाहिए। मैं भी दोबारा यहां आऊंगा।"

मौधा के शहीदो से प्रेरणा लेकर आज भी गाँव के युवा सेना में बड़ी संख्या में उत्साह से भर्ती होते है और उनहे गर्व है की सबसे ज्यादा शहीदो वाले गाँव होने का गौरव उनके गाँव को प्राप्त है।
बलिदानियों की भूमि मौधा और उसके सपूतो को हमारा शत शत नमन_/\_
राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास
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7 comments:

  1. Bharat mata ki jai jai jawan jai kisan

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  2. शत शत नमन वीर राठौर सैनिकों को। I'm from neighboring village,Gosarpur and our fifth generation is in Indian Army, Lt Vikramaditya Singh Rathore, 4 Dogra Regt..I feel proud to be part of such glorious and honourable clan..
    Col Sudhir Singh Rathore

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  3. salute to our matryr rathore brother. i am from village ganapatipur badapur(etah) seventh village of raja ka rampur throne

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  4. Shree man ji agar aapke pass बहरेलिया राजपूत का इतिहास . गोद भारद्वाज, वंश - बैस
    की गोद सिसोदिया, वेद - यजुर्वेद, कुलदेवी - बनेशवरी या बनमता, कुलदेवता - शिवजी , Taluqa - सूरजपुर Bahrela, जिला -
    बाराबंकी और रायबरेली
    Reference Books – Gazetteer of Barabanki 1891 से सम्बंधित कोई जानकारी हो तो प्लीज शेयर करो (44 नम्बर राजपूत वंशावली ) सूर्यवंश

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